Atmadharma magazine - Ank 033
(Year 3 - Vir Nirvana Samvat 2472, A.D. 1946)
(Devanagari transliteration).

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मुख्यपणे अज्ञानताना कारणे प्राप्त
थती योनि अने कूळनुं स्वरूप तथा
१. जे स्थानमां रहीने जीवनी उत्पत्ति थाय ते आधारने योनि कहेवामां आवे छे. जे परमाणुओ स्वयं
जीवना शरीरमय परिणमे तेने कूळ कहेवामां आवे छे.
(जुओ तत्त्वार्थसार अध्याय २ सूत्र १०५–१०६, तथा ११२ थी ११६ सूत्रनी टीका, पानुं ८७–८८)
२. योनि शब्दनी व्युत्पत्ति आ प्रमाणे छे–यौति मिश्ररूप थवुं; औदारिकादिक नोकर्म वर्गणारूप
पुद्गलोनी साथे जीवनो संबंध जे स्थानमां थाय ते स्थानने योनि कहे छे. टूंकामां कहीए तो जीवना
उत्पत्तिस्थानो ते योनि छे. (गोमट्टसार–जीवकांड गाथा ८१ टीका, पानुं २०३) जीवने उपजवाना आधारभूत
पुद्गलस्कंधनुं नाम योनि छे.
३. टुंकामां योनिना भेद पाडवामां आवे तो नीचे मुजब नव भेद पडे छे–
योनिना भेद ते भेद कोने होय? योनिना भेद ते भेद कोने होय?
(१) सचित्त... ... ... ... साधारण शरीर (६) शीतोष्ण... ... ... देव, नारकी
(२) अचित्त... ... ... देव, नारकी (७) संवृत्त... ... देव, नारकी, एकेन्द्रिय
(३) सचित्ताचित्त... ... ... गर्भज (८) विवृत्त... ... ... विकलेन्द्रिय
(४) शीत...तेजस्कायिक अने देव–नारकीओने छोडीने (९) संवृत्तविवृत... ... ... गर्भज
(५) उष्ण... ... ... तेजस्कायिक
४. ए नव भेदनो विस्तार करतां नीचे मुजब ८४ लाख भेद पडे छे.
(१) नित्यनिगोद (२) ईतरनिगोद (३) पृथ्विकाय (४) जलकाय (५) तेजसकाय तथा (६)
वातकायिक–आ छ स्थानमां दरेकनी सात लाख योनि छे; (७) प्रत्येक वनस्पतिनी दस लाख योनि छे; (८)
बेइंन्द्रिय (९) त्रण ईन्द्रिय अने (१०) चौरेन्द्रिय ए दरेकनी बबे लाख योनि छे, (११) देव, (१२) नारकी
अने (१३) पंचेन्द्रियतिर्यंच ए दरेकनी चार चार लाख योनि छे; अने (१४) मनुष्यनी चौद लाख योनि छे; ए
रीते बधी मळीने संसारी जीवनी ८४ लाख योनि छे.
(गोमट्टसार जीवकांड गाथा ८९ टीका, पानुं २१२)
५. प्रश्न:– सर्वे जीवोने एक ज प्रकारनी योनि होवी जोईए?
उत्तर:– ना, तेम नथी; कारणके, जुदा जुदा आत्माओने भिन्न भिन्न सुख–दुःखनो अनुभव होय छे, जुदा
जुदा आत्माओना शुभाशुभ परिणाम भिन्न भिन्न छे अने ते परिणामना निमित्ते थतो कर्मबंध पण विचित्र
छे; अने ते विचित्र कर्मबंधना उदयमां जोडातां सुख–दुःखना अनुभवना कारणरूप योनिनो संयोग पण जुदा
जुदा प्रकारनो होवो जोईए.
(जुओ तत्त्वार्थराजवार्तिक अध्याय २ सूत्र ३२ नीचेनी कारिका १७–१८)
६. प्रश्न:– ए नव प्रकारनी योनिओना ८४ लाख भेद कई अपेक्षाए पडे छे?
उत्तर:– संसारी आत्माओने कर्मोना उदयना भेद जुदा जुदा प्रकारना छे ते भेदना कारणे योनिओना
चोराशी लाख भेद पडे छे.
योनिना बे प्रकार छे– (१) आकार योनि अने (२) गुणयोनि. आ चोराशी लाख भेदो गुणयोनिनी
अपेक्षाए छे अर्थात् योनिना स्पर्श, वर्ण, रस अने गंधनी तारतम्यतानी अपेक्षाए आ ८४ लाख भेद पडे छे.
केवळज्ञानी पोताना दिव्यज्ञानथी आ भेदोने प्रत्यक्ष जाणे अने अल्पज्ञानी आगम द्वारा जाणे छे,
(राजवार्तिक कारिका २८, पानुं ७१०–७११)
७. प्रश्न:– मनुष्यनी योनि सचित्ताचित्त (–मिश्र) शा माटे कहेवामां आवे छे?
उत्तर:– जे जीव गर्भज छे तेनी योनि मिश्र जाणवी, केम के माताना गर्भमां वीर्य अने लोही छे ते
अचेतन छे अने त्यां योनिस्वरूप आत्मप्रदेश छे ते चेतन छे माटे ते मिश्र छे. आ योनिना भेदो
मनुष्यिणीओनी संख्याना कारणे नथी पण योनिना नव प्रकारोमां स्पर्शादिकनी तारतम्यताना कारणे आ भेदो
पडे छे. आ प्रमाणे ते गुणयोनिना भेदो छे.
८. प्रश्न:– आकारयोनिना केटला भेदो छे?
उत्तर:– आकारयोनिना त्रण प्रकार छे– (१) शंखावृत (२) कुर्मोन्नत अने (३) वंशपत्र. पहेलां
प्रकारमां गर्भ रहेतो नथी, अगर जो रहे तो नष्ट थई जाय छे. बीजा प्रकारनी योनिमां तीर्थंकर, चक्रवर्ती,
वासुदेव, प्रतिवासुदेव तथा बळभद्र जन्मे छे. त्रीजी वंशपत्रयोनिमां बाकीना गर्भज जीवो जन्मे छे.
शंखावृत=शंख जेवा आकारनी;
(वधु माटे जुओ पानुं छेल्लुं)