Atmadharma magazine - Ank 056
(Year 5 - Vir Nirvana Samvat 2474, A.D. 1948)
(Devanagari transliteration).

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फरी वळ्‌युं, अने ते माटे तैयारीओ थवा मांडी. मुमुक्षुओ ते उजजवळ दिननी अतुरताथी राह जोई रह्या हता के
जे दिवसे तेमना तारणहार आ भरतमां उतर्या हता.
वैशाख सुद एकम आवी.... सवारमां ज ‘सद्धर्मप्रभावक दुदुंभी मंडळी’ना वाजिंत्रो मंगळनादथी गाजी
उठयां... अने नजीक आवी पहोंचेला ए महामंगळ प्रसंगनी वधामणी सर्वत्र पहोंचाडी दीधी. तरत ज
मुमुक्षुओनां टोळां पू. गुरुदेवश्रीना दर्शने आव्या, तेमनी स्तुति करी, जयकार कर्यो. पछी जिनमंदिरमां
समूहपुजन कर्युं. त्यार पछी सर्वे मुमुक्षुओनो संघ भेगो थईने गाजते–वाजते पू. गुरुदेवश्रीनी वाणीनुं श्रवण
करवा आव्यो अने पू. गुरुदेवश्रीनी अमृतवाणीनुं सततपणे एक कलाक श्रवण कर्या बाद पोणो कलाक सुधी
जन्मोत्सव संबंधी भक्तिभावनाओ करवामां आवी हती. तेमज पू. गुरुदेवश्रीना अध्यात्म तत्त्वज्ञाननो आखा
जगतमां प्रचार थाय अने आ ५९ मी जयंतिनो महोत्सव चिरंजीव बनी रहे ते माटे ५९ नां मेळवाळो एक
फाळो शरू थयो हतो. जेमां एकंदर लगभग २४००/– रूा. थया हता. (जेनी विगत आ अंकमां अन्यत्र
आपवामां आवी छे.) त्यारबाद लगभग १० वागे पू. गुरुदेवश्री आहार माटे पधार्या हता. आ दिवसे
आहारदान शेठ श्री नानालालभाईने त्यां थयुं हतुं. आहारदान प्रसंगनी भक्ति ए एक खास प्रसंग हतो,
आखो संघ उल्लासित हतो, अने शेठश्री नाना–लालभाई वगेरे पू. गुरुदेवश्री पासे भक्तिथी नाची उठया हता.
बपोरे व्याख्यान पछी जिनमंदिरमां भक्ति वखते, हंमेश करतां विशिष्ट एक प्रसंग ए बन्यो के भक्ति वखते
पू. पवित्र बन्ने बहेनो प्रभुसन्मुख ऊभा ऊभा भक्ति गवरावता हता. ए वखतनी तेओश्रीनी उत्कट भक्ति
भावनानो ख्याल तो, ते वखते जेणे तेमनी मूद्रा निहाळी होय तेने ज आवी शके.
रात्रे, मुमुक्षुमंडळनुं मुख्य घर ५९ दीपकोनी ज्योतिथी जगमगी रह्युं हतुं. सोनगढ जेवा गामडामां
आटला दीपको पहेली ज वार थया हशे.
× × × ×
वैशाख सुद बीज
वैशाख सुद एकम आवी अने पूज्य गुरुदेवश्रीना जन्मोत्सवनी वधामणी आपीने चाली गई. वैशाख
सुद बीजनो सूर्य उदय थईने जगतना अंधकारनो नाश करे त्यार पहेलांं तो, जगतना अज्ञान अंधकारने नाश
करवा माटे ‘कहान–सूर्य’नो जगतमां उदय थयो. धर्मने नामे चाली रहेला पाखंडोने जडमूळथी उखेडी नांखवा
माटे ‘ज्ञान–भानु’नो अवतार थयो; भरतने जेवा धर्म युगसर्जक पुरुषनी जरूर हती तेवा ज पुरुषनो जन्म
थयो.... मंगळ वाजिंत्रोना नादथी एनी वधामणी सर्वत्र पहोंची गई. स्वाध्यायमंदिर ५९ दीपकोथी झगमगी
ऊठयुं. आखो मुमुक्षुसंघ “शुं छे शुं छे भरत मोझार!– भरते जनम्या कहान गुरुराज... सद्गुरुवंदन जईए....”
एम गातो गातो उलटभेर गुरुदेवश्रीना दर्शने आवी पहोंच्यो.... प्रथम स्वाध्यायमंदिरने त्रण प्रदक्षिणा करीने
तेमां प्रवेश कर्यो. श्री गुरुदेवश्रीनी खूब भावभीनी स्तुति करी... अने ए भक्तिरूपी जळवडे भावथी
जन्माभिषेक कर्यो. आ पवित्र प्रसंगे आखा गाममां घेर घेर साकर वहेंचाणी. सवारमां श्रीजिनमंदिरमां
महापूजन थयुं. पूजन बाद प्रदक्षिणा करीने तरत ज श्री समयसारजीनी रथयात्रा नीकळी अने आखा गाममां
फरी. रथयात्रा पछी पू. गुरुदेवश्रीए एवो अपूर्व कल्याणकारी तत्त्वोपदेश संभळाव्यो के जे सांभळतां,
‘ज्ञानीओनो जन्म जगतना जीवोना उद्धारने माटे ज छे’ ए वातनी सिद्धि आपोआप थई जती हती.
व्याख्यान पूरुं थया बाद तरत ज, पूज्य गुरुदेवश्री जेवा दिव्य आत्मा आपणने मळ्‌या ते मांगळिक दिवस
आजे होवाथी, सकलसंघनी वती श्रीमान् प्रमुखश्री रामजीभाई, हिंमतभाई, खीमचंदभाई, नेमीचंदभाई
पाटनी अने प्रेमचंदभाईए पोताना वक्तव्य–द्वारा आ महा प्रसंगनी खुशाली अने पू. गुरुदेवश्री प्रत्येनी महा
भक्तिनी जाहेरात करी हती. जेनो सार आ अंकमां आपवामां आव्यो छे ते वांचीने ए महान दिवसना
उत्सवनो झांखो झांखो ख्याल वांचकोने आवशे. आ उपरांत ५९ नी रकमना मेळवाळुं फंड पण आगळ चाल्युं
हतुं. लगभग दस वागे पू. गुरुदेवश्री आहार माटे पधार्या हता. आजे आहारदान प्रसंग पू. बेनश्री बेन तथा
श्री गंगा बेनना घेर थयो हतो. ते प्रसंगे गई कालना जेवा उत्साहथी भक्ति करवामां आवी हती.
बपोरे १।। थी २।। सुधी, जन्मोत्सव निमित्ते बालिकाओए संवाद कर्यो हतो. संवाद द्वारा, ‘देवलोकमां
मुद्रक: चुनीलाल माणेकचंद रवाणी, शिष्ट साहित्य मुद्रणालय, मोटा आंकडिया, सौराष्ट्र ता. ५ – ६ – ४८
प्रकाशक: श्री जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट सोनगढ वती जमनादास माणेकचंद रवाणी, मोटा आंकडिया, काठियावाड