जेठ : २४७४ आत्मधर्म : १३१ :
पण गुरुदेवश्रीनो जन्मोत्सव थाय छे’ एवुं द्रश्य बताववामां आव्युं हतुं. ते वखते ईन्द्र अने देवीओना रूपमां
बालिकाओनी भक्ति वगेरे जोतां, जाणे के गुरुदेवश्रीनो जन्मोत्सव उजववा माटे देवलोकनी देवीओ ज पोते
प्रवचनमंडपमां ऊतरी पडी होय–एवुं लागतुं हतुं. ३ थी ४ ना व्याख्यान पछी जिनेन्द्रदेवनी आरतीनुं घी
बोलायुं. जेमां सीमंधरप्रभुनी आरतीनुं घी २०१ मण थयुं. एक वखत प्रतिष्ठा महोत्सव प्रसंग सिवाय, आटलुं
घी कदी थयुं नथी. आरतीनुं घी बोलाया पछी भक्ति थई. जिनमंदिरमां समावेश थई शकतो नहि होवाथी
आजनी भक्ति श्री प्रवचन मंडपमां थई हती. आजे भक्ति वखते त्रण स्तवनो गवायां हता. भक्ति साथे
साथे इंद्रवेशमां भाईओ दांडिया–रास खेलता हता.
सांजे आरती थई. आरती पछी, आजे रात्रे पू. गुरुदेवश्रीनी भक्तिभावना करवा माटे ८।। थी ९।।
सुधी एक खास सभा करवामां आवी हती. रात पडतां स्वाध्यायमंदिर ५९ दीपकोथी शोभतुं हतुं. तेम ज
मंडळनुं मुख्य घर पण ५९ दीपकोथी झगमगतुं हतुं. ८।। वागे सभानी शरूआतमां भाईश्री हिंमतलालभाईए
मंगळाचरण करीने, वैराग्य अने भक्तिथी भरपूर बे काव्यो गाया हता. त्यार पछी पू. बेनश्रीबेने बे भक्ति
स्तवनो गवडाव्या हता अने भाईओए रास लीधो हतो.
ए रीते वैशाख सुद बीजनो दिवस बहु ज उत्साहथी उजवायो हतो.
वैशाख सुद त्रीजना दिवसे सवारना व्याख्यान बाद ज्ञान–पूजन राखवामां आव्युं हतुं. ए सिवायनो
बीजा बधो कार्यक्रम पहेला दिवस मुजब ज उत्साहथी उजवायो हतो.
आ रीते, परम उपकारी पूज्य सद्गुरुदेवश्रीनी जन्मजयंतिनो कल्याणकारी दिवस खास महोत्सवपूर्वक
उजववानी शरूआत थई छे, आ वर्षे घणा उत्साहपूर्वक ए मंगळ उत्सव उजवायो हतो. आथी पण विशेष
विशेष उत्साहपूर्वक पू. गुरुदेवश्रीनी सेंकडो वर्षगांठ उजवाओ... भरतना भव्य जीवोनो उद्धार करनार गुरुदेव
चिरंजीव रहो... अमर रहो... जयवंत वर्तो... नमस्कार हो ते मंगलस्वरूप महात्माने!
[श्रीमान रामजीभाई माणेकचंद दोशीना भाषणनो सार]
आजनो दिवस परम मांगळिक छे. आजे परमपूज्य सद्गुरुदेवश्रीने ५८ मुं वर्ष पूरुं थईने ५९ मुं वर्ष
बेसे छे. तेओश्री जैनधर्मनो परम सत्य उपदेश सततपणे आपी रह्या छे अने अनेक अनेक जीवो एक अथवा
बीजी रीते तेनो लाभ लई रह्या छे. पू. गुरुदेवश्री द्वारा जैनधर्मनी महान प्रभावना थई छे अने मुमुक्षु जीवोने
आत्मकल्याणना साचा मार्गनो लाभ मळी रह्यो छे.
पू. गुरुदेवश्रीना प्रतापे अत्यारे महान धर्मकाळ वर्ती रह्यो छे. भूतकाळ तरफ नजर लंबावतां आवी
धर्मप्रभावना आ देशमां घणा काळमां देखाती नथी. आ सौराष्ट्र देशमां तीर्थंकर श्री नेमिनाथ भगवाननुं
समोसरण हतुं ते काळ बाद करीने जोतां, त्यार पछी एवो कोई काळ जोवामां आवतो नथी के ज्यारे सौराष्ट्र
देशमां वीतरागधर्मनो आवो उपदेश अविरतपणे घणा वर्षो सुधी हजारो जीवोने मळ्यो होय. आजे गुरुदेवश्री
एकधाराए परम सत्य उपदेश आपी रह्या छे अने आपणे बधा ते उपदेशनो लाभ लईए छीए ते आपणा
परम भाग्यनी निशानी छे.
केवळज्ञाननुं स्वरूप शुं अने पात्र जीवो ते केवी रीते पामी शके तेनुं रहस्य अत्यारे ज पू. गुरुदेवश्रीए
आपणने व्याख्यानमां समजाव्युं छे. जेम पू. गुरुदेवश्रीए ठेठ केवळज्ञान पामवा सुधीनो उपाय आपणने
समजाव्यो तेम केवळज्ञान पामतां सुधी पण पूज्य गुरुदेवश्री आपणने साथे ने साथे राखे–तेओश्रीनी साथे
रहीने आपणे पण केवळज्ञान पामीए–एवी आपणी भावना छे.
घणा लांबा काळथी आ देशमां जैनधर्मना नामे अजैन वातो अने अजैन उपदेश चाली रह्यो छे अने
जैनधर्मना बहानां हेठळ अज्ञान अंधकार छवाई रह्यो छे;–एवा आ विषमकाळमां परम पूज्य सद्गुरुदेवे
सम्यग्ज्ञान ज्योति आगळ धरीने लोकोने ऊंधा मार्गथी थंभावीने, जैनधर्मनुं खरूं स्वरूप शुं छे ते समजाव्युं छे,
अने समजावी रह्या छे. ‘ पुण्यथी धर्म थाय, जड शरीरनी क्रियाथी धर्म थाय ’– एवा एवा जैनधर्मना नामे
चालता पोकळ उपदेशनुं मिथ्यापणुं तेओश्रीए प्रगटपणे बताव्युं छे. दिन प्रतिदिन गुरुदेवश्रीना उपदेशनो