Atmadharma magazine - Ank 175
(Year 15 - Vir Nirvana Samvat 2484, A.D. 1958)
(Devanagari transliteration).

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आत्मधर्म
वर्ष पंदरमुं संपादक वैशाख
अंक सातमो रामजी माणेकचंद दोशी २४८४
मोक्षना कारणरूप सामायिक
मुनिओने निश्चयथी करवा योग्य जे छ आवश्यक तेमां पहेलुं सामायिक छे.
जे अन्यवश नथी एटले के रागने वश नथी पण स्ववश छे एटले के मात्र निज
आत्माने ज अवलंबे छे एवुं जे अवश–कार्य, स्वाधीन कार्य ते सामायिकादि आवश्यक छे.
स्वभावमांथी खसीने पराश्रये जे रागादि थाय ते तो परवशपणुं छे, ते सामायिक नथी,
आवश्यक नथी, निश्चयथी करवा जेवुं ते कार्य नथी. चैतन्यस्वरूप आत्मामां एकाग्रताथी
स्ववशपणे उत्पन्न थतुं जे वीतरागी सामायिक ते मोक्षनुं कारण छे, ते मुनिओनुं आवश्यक
कर्म छे. आत्मस्वभावमां स्थिरतारूप आ सामायिकधर्म ते सकळ कर्मनो क्षय करवामां कुशळ
छे, ने ते ज निर्वाणनो प्रसिद्ध मार्ग छे. शुद्धचैतन्यपदना निर्दोष आसन उपर आरूढ थईने जे
जीव आवुं सामायिक करे छे तेने निर्विकल्प आत्मसुखनुं वेदन थाय छे, ते साक्षात् धर्म छे...आ
सिवाय बहारना पाथरणामां, देहनी स्थिरतामां, वचनमां के शुभरागमां क्यांय सामायिक
रहेती नथी. सामायिक तो जैनज्योति छे, चैतन्यज्योतमां स्थिरता वगर ए वीतरागी
जैनज्योति (सामायिक) प्रगटे नहि, ने एवी सामायिक वगर मुक्ति थाय नहि. मोक्षनो मार्ग
“सामायिक” छे,–ते आत्माना ज आश्रये रचायेलुं छे एटले के स्ववश छे, अन्यवश नथी.
शुं पाथरणांने वश सामायिक छे? ना. शुं शरीर स्थिर बेठुं तेने वश सामायिक छे? ना.
शुं वचननी क्रियाने वश सामायिक छे? ना.
तो शुं शुभरागने वश सामायिक छे?–तेनी पण ना.
तो सामायिक कोने वश छे? सामायिक स्ववश छे, एटले के पोताना आत्मस्वभावने
आधीन ज सामायिक छे, ए सिवाय अन्य कोईने वश सामायिक नथी.
संपूर्णपणे शुद्ध आत्माने ज वश वर्तता सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्ररूप जे वीतरागी
सामायिक छे ते ज कर्मक्षय करीने मोक्ष प्राप्त करवामां कुशळ छे, तेनामां ज निर्विघ्नपणे मोक्ष
पमाडवानी ताकात छे, वच्चे व्यवहारमार्ग (राग) आवे ते कांई कर्मक्षय करवामां के मोक्ष
प्राप्त करवामां कुशळ नथी, ते तो कर्मनुं बंधन करनार छे; तेनामां कर्मनो क्षय करीने मोक्ष
पमाडवानी ताकात नथी. माटे शुद्ध आत्माने आश्रये वर्ततुं स्ववश सामायिक ज आवश्यक छे–
ते ज मोक्षने माटे अवश्य करवा जेवुं कार्य छे; तेने ज जिनशासनना संतोए निर्वाणनो मार्ग
कह्यो छे. – (नियमसार कळश २३८ना प्रवचनमांथी)