: २० : आत्मधर्म : पोष : २४९३
भराई गयो; क््यांक वाजां वागता हता, क््यांक गीत गवाता हता, क््यांक नृत्य थता
हता; एम मंगलउत्सव थयो. दिग्कुमारी देवीओ अनेक प्रकारे मरुदेवीमातानी सेवा
करती हती, तथा विविध गोष्ठीवडे तेमने प्रसन्न राखती हती. अने कहेती हती के हे
माता! गर्भस्थ पुत्रद्वारा आपे जगतनो संताप नष्ट कर्यो छे तेथी आप जगतने पावन
करनारा जगतमाता छो. हे माता! आपनो ते पुत्र जयवंत रहे के जे जगतविजेता छे,
सर्वज्ञ छे, तीर्थंकर छे, सज्जनोनो आधार छे ने कृतकृत्य छे. हे कल्याणि माता! आपनो
ते पुत्र सेंकडो कल्याण दर्शावीने, पुनरागमन रहित एवा मोक्षस्थानने प्राप्त करशे.
ते देवीओ अनेक प्रकारे आनंद–प्रमोद सहित मरुदेवीमाता साथे प्रश्न चर्चा पण
करती हती.
देवी–हे माता! जगतमां उत्तम रत्न कयुं छे?
माता–सम्यग्दर्शनरत्न जगतमां श्रेष्ठ छे.
देवी–जगतमां कोनो अवतार सफळ छे?
माता–जे आत्माने साधे तेनो अवतार सफळ छे.
देवी–हे माता! जगतमां कई स्त्री उत्तम छे?
माता–तीर्थंकर जेवा पुत्रने जे जन्म आपे ते.
देवी–हे माता! जगतमां बहेरो कोण छे?
माता–जिनवचनने जे नथी सांभळतो ते.
देवी–माता! जल्दी करवा जेवुं कार्य कयुं?
माता–संसारनो त्याग ने मोक्षनी साधना.
देवी–हे माता! कोने जीतवाथी त्रण जगत वश थाय?
माता–मोहने जीतवाथी त्रण जगत वश थाय.
देवी–जगतमां कोनी उपासना करवी?
माता–पंचपरमेष्ठी भगवाननी.