: आसो : २४९३ आत्मधर्म : २७ :
७४. सहज स्वरूपथी जीव रहित नथी, पण ते सहज स्वरूपनुं मात्र भान जीवने
नथी. जे थवुं ते ज सहजस्वरूपे स्थिति छे. (वर्ष २८, ६०९)
७प. ए ज माटे सर्व तीर्थंकरादि ज्ञानीओए असंगपणुं ज सर्वोत्कृष्ट कह्युं छे, के
जेना अंगे सर्व आत्मसाधन रह्यां छे. (वर्ष २८, ६०९)
७६. जेम छे तेम आत्मस्वरूप जाण्युं तेनुं नाम समजवुं छे; तेथी उपयोग अन्य
विकल्प रहित थयो तेनुं नाम शमावुं छे, वस्तुताए बंने एक ज छे. (वर्ष २९, ६प१)
७७. अनंतकाळथी यम, नियम, शास्त्रावलोकनादि कार्य कर्या छतां समजावुं अने
शमावुं ए प्रकार आत्मामां आव्यो नहीं. अने तेथी परिभ्रमणनिवृत्ति थई नहीं. (वर्ष
२९, ६प१)
७८. शुद्ध चैतन्यस्वरूप अविनाशी एवो हुं आत्मा छुं, एम आत्मभावना
करतां रागद्वेषनो क्षय थाय. (७१०)
७९. एक होय त्रण काळमां, परमार्थनो पंथ, प्रेरे जे परमार्थने, ते व्यवहार समंत.
८०. सर्वथा स्वभावपरिणाम ते मोक्ष छे. सत्गुरु–सत्संग, सत्शास्त्र,
सद्दविचार अने संयमादि तेनां साधन छे. (७१०)
८१. सर्व अवस्थाने विषे, न्यारो सदा जणाय, प्रगटरूप चैतन्यमय ए एंधाण
सदाय.
८२. देह छूटवानो काळ अनियमित होवाथी विचारवान पुरुषो अप्रमादपणे
प्रथमथी ज तेनुं ममत्व निवृत्त करवानो उपाय साधे छे. (वर्ष ३० ७२८.)
८३. आत्मभ्रांति सम रोग नहीं, सद्गुरु वैद्य सुजाण,
गुरु–आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान.
८४. अपूर्व अवसर एवो क््यारे आवशे, क््यारे थईशुं बाह्यांतर निर्ग्रंथ जो.
सर्व संबंधनुं बंधन तीक्ष्ण छेदीने, विचरशुं कव महत् पुरुषने पंथ जो.
८प. सतत् अंर्तमुख उपयोगे स्थिति ए ज निर्ग्रंथनो परम धर्म छे. एक समय
पण उपयोग बर्हिमुख करवो नहीं ए निर्ग्रंथनो मुख्य मार्ग छे. (वर्ष ३०, ७६७)
८६. द्रव्य क्षेत्र ने काळ भाव प्रतिबंधविण, विचरवुं उदयाधीन पण वीत लोभ जो...
८७. केवळ अंर्तमुख थवानो सत्पुरुषोनो मार्ग सर्व दुःखक्षयनो उपाय छे.
(वर्ष ३१, ८१६)
८८. हे आर्य! निराशा वखते महात्मा पुरुषोनुं अद्भुत आचरण संभारवुं
योग्य छे. (वर्ष ३२, ८७९)