: ३८ : आत्मधर्म : कारतक : २४९४
(६०) जगतने रूडुं देखाडवा अनंतवार प्रयत्न कर्युं तेथी रूडुं थयुं नथी, केम के परिभ्रमण अने
परिभ्रमणना हेतुओ हजु प्रत्यक्ष रह्यां छे. ए भव जो आत्मानुं रूडुं थाय तेम व्यतीत
करवामां जशे तो अनंत भवनुं साटुं वळी जशे. (३७)
(६१) ‘सत्’ ने विषे प्रीति, ‘सत्’ रूप संतने विषे परम भक्ति, तेना मार्गनी जिज्ञासा, ए
ज निरंतर संभारवा योग्य छे. ते स्मरण रहेवामां उपयोगी एवा ‘वैराग्यादि
चरित्रवाळा पुस्तको, अने वैरागी सरळ चित्तवाळा मनुष्यनो संग, अने पोतानी
चित्तशुद्धि, –ए सारां कारणो छे. (२३८)
(६२) केवळ अंतर्मुख थवानो सत्पुरुषोनो मार्ग सर्व दुःखक्षयनो उपाय छे. पण ते कोईक
जीवने समजाय छे. महत्पुण्यना योगथी, विशुद्धमतिथी, तीव्र वैराग्यथी अने सत्पुरुषना
समागमथी ते उपाय समजावा योग्य छे. ते समजवानो अवसर एकमात्र आ मनुष्यदेह
छे. ते पण अनियमित काळना भयथी गृहीत छे. त्यां प्रमाद थाय छे ए खेद अने
आश्चर्य छे. (८१६)
(६३) प्रमाद परम रिपु छे–ए वचन जेने सम्यक् निश्चित थयुं छे, ते पुरुषो कृतकृत्य थतां सुधी
निर्भयपणे वर्तवानुं स्वप्ने पण ईच्छता नथी. (८प३)
(६४) त्याग, वैराग्य, उपशम अने भक्ति मुमुक्षु जीवे सहज स्वभावरूप करी मुकया विना
आत्मदशा केम आवे ?(६४६)
(६प) लौकिकद्रष्टि अने ज्ञानीनी द्रष्टिने पश्चिम–पूर्व जेटलो तफावत छे. जे जीवोए परिषह
वेठीने थोडा काळ सुधी ते (ज्ञानीनी) द्रष्टिनुं आराधन कर्युं छे ते सर्व दुःखना क्षयरूप
निर्वाणने पाम्या छे, तेना उपायने पाम्या छे. (८१०)
(६६) लौकिक विशेषतामां कांई सारभूतता नथी–एम निश्चय करवामां आवे तो मांड
आजीविका जेटलुं मळतुं होय तोपण तृप्ति रहे. मांड आजीविका जेटलुं मळतुं न होय
तोपण मुमुक्षु जीव आर्त्तध्यान घणुं करीने थवा न दे. अथवा थये ते पर विशेष खेद करे.
(७०६)
(६७) मांडमांड आजीविका चालती होय तोपण मुमुक्षुने ते घणुं छे, केमके विशेषनो कांई अवश्य
उपयोग नथी. (७०६)
(६८) हे जीव! तुं भ्रमा मा. तने हित कहुं छुं, सुख अंतरमां छे, बहार शोधवाथी मळशे नहीं.
(१०८)
(६९) वीतरागनो कहेलो परम शांतरसमय धर्म पूर्ण सत्य छे, एवो निश्चय राखवो. (प०प)
(७०) हे सर्वोत्कृष्ट सुखना हेतुभूत सम्यग्दर्शन! तने अत्यंत भक्तिथी नमस्कार हो.