: २६ : आत्मधर्म : भादरवो : २४९४
जुओ, आ वीतरागनां वचनो! अमृतस्वरूप परम शांत आत्मानो अनुभव
करावनारां वचनोने पण ‘अमृत’ कह्यां छे–
वचनामृत वीतरागनां... परम शांतरसमूळ.
भाई, तुं तारा चैतन्यस्वभावने स्पर्श एटले तेने अनुभवमां ले. एना अनुभव
वगरनुं जाणपणुं ए तो बधा विकल्पो छे. स्वध्येयने जे चूक्यो तेने साधकपणुं केवुं ?
सम्यग्द्रष्टि–साधकना ध्येयमां निरंतर रात–दिन अखंड धारापणे पोतानो शुद्धआत्मा ज
बिराजे छे; एना सिवाय बीजानी अधिकता कदी भासती नथी. तेने स्याद्वादमां कुशळता
छे एटले के द्रव्य–पर्यायरूप वस्तुना अनुभवमां तेने कुशळता छे; मतिश्रुतज्ञान ने
अंतर्मुख करीने आत्माने प्रत्यक्षरूप कर्यो छे; विकारथी जुदो, उपर तरतो आत्मा
अनुभवमां लीधो छे. रागने ते क्षणमात्र नथी भावतो, शुद्धआत्माने सतत निरंतर
भावे छे....जेणे आवुं स्वरूप जाण्युं छे–अनुभव्युं छे तेने ज मोक्षमार्ग छे.
थोडा शब्दोमां मोटा भावो भर्या छे....अहा, संतोए अनुभवना मार्ग खुल्ला
मुक्या छे....गुरुदेव संत–मुनिओ प्रत्येनी भक्तिथी वारंवार कहे छे के ‘अहो! संतोए
मारग सहेला करी दीधा छे!’ अने ‘अमृत वरस्या छे पंचम काळमां....अमृत वरस्या
छे तारा आत्मामां.’ (गुरुदेवना आवा हितप्रेरक उद्गारो सांभळतां श्रोताजनोनां हैडां
हर्षविभोर बनीने नाची ऊठे छे.)
भाई, मोक्षमार्गनुं साधन तारामां भर्युं छे. नित्य–परिणामी वस्तु छे, द्रव्यपणे
नित्य छे ने पर्यायरूपे परिणामी छे. आवी द्रव्यरूप–पर्यायरूप वस्तुनो अनुभव
करवामां धर्मी जीवो कुशळ छे. अने आवो अनुभव करतां रागादि अशुद्धपरिणति छूटी
जाय छे, अशुद्धता रहित एवी वीतरागी शुद्धपरिणति वगर शुद्धवस्तुनो अनुभव थाय
नहीं; सम्यग्द्रष्टिने चोथा गुणस्थाने अनुभूतिनी जे शुद्धपर्याय छे ते पण वीतराग छे,
राग वगरनी छे. रागवडे कांई शुद्धआत्मानी अनुभूति न थाय. एक शुद्धआत्माने जेणे
जाण्यो तेणे सर्व जाण्युं; अरिहंतोने अने सिद्धोने तेेणे ओळख्या, मुनिने अने ज्ञानीने
तेणे खरेखरा ओळख्या. केमके ज्ञानी–मुनि ने केवळी ते बधाय पण आवा शुद्धआत्माना
अनुभवस्वरूप छे; पोते एवो अनुभव करीने तेमनी नातमां भळ्यो त्यारे तेमनी खरी
ओळखाण थई...ते साधक थयो. ने ज्ञानमां ज पूर्ण एकाग्रता वडे ते अल्पकाळमां
केवळज्ञानरूप साध्यदशाने पामशे. आ रीते साधक अने साध्य बंने भावो ज्ञानस्वरूप
आत्माना अनुभवनी भूमिकामां ज समाय छे. शुद्धजीवना स्वरूपनो अनुभव
मोक्षमार्ग छे.