: मागशर : २४९प आत्मधर्म : ३३ : A
(नाना–मोटा सर्वे जिज्ञासुओनो प्रिय विभाग)
* निजानंद भाई–मुंबई: गुरुदेव साथे थयेल यात्रानी नोंध आपे तैयार करेल
छे ते बदल धन्यवाद! ते अहीं जोवा मोकलशो एटले योग्य करीशुं. अंजलि अंक बाबत
मुंबईना बालविभागना प्रतिनिधिओनो संपर्क साधशो.
* मुंबईथी बलुभाई चुनीलाल शाह (जेमणे हमणां मलाडमां जिनमंदिरनुं
शिलान्यास कर्युं) तेओ प्रमोदथी लखे छे के “आत्मधर्ममां पुनरावर्तनरूप परीक्षानो
विभाग शरू कर्यो ते माटे धन्यवाद! वांचकवर्ग शुं वांची गयो, केटलुं पचावी चिंतन कर्युं
तेनी सुंदर कसोटी मुकी छे. वांचेलुं फरी सुंदर रीते घूंटाय छे. दिनप्रतिदिन जे उच्चज्ञान
आत्मधर्म आपी रह्युं छे ने सुंदर वांचन पीरसाई रह्युं छे ते एटलुं हृदयगम्य छे के
बीजी नकल क्यारे आवे एवी अधीराई वांचक वर्गने उद्भवे छे.” (आ विभागमां
बीजा केटलाय जिज्ञासुओए रस बताव्यो छे ने उत्साहथी भाग लीधो छे.)
* जोरावरनगरथी सुरेश अने विलाबेन लखे छे के–“कारतकनुं आत्मधर्म अने
तेमां ‘बे सखीनो संवाद’ वांची खूब आनंद थयो...एमनी साथे अमे पण सुवर्णधाममां
पहोंचीने आत्माना अनुभवनी वात सांभळीए अने वहाला गुरुदेवना दर्शन करीए
एवी भावना थाय छे.
* संस्कारी कुटुंबनो एक बाळक (जेने ईंग्लीश आवडतुं हतुं पण गुजराती
बराबर आवडतुं न हतुं–) उत्साहथी बालविभागनो सभ्य थवा आव्यो.....सभ्य कार्डमां
नाम भर्युं. “....एच. शाह” ज्यारे तेनुं सभ्य–पत्रक (आंबाना झाडवाळुं) आपवा माटे
तेमां लख्युं के..... एच. जैन”–त्यारे जाणे के तेमां भूल थई होय तेम ते बोली उठयो के
‘जैन नहि पण शाह लखो.’ तेने समजाव्युं के ‘भाई! आपणे बधाय जैन छीए.’–शाह
होय, महेता होय के दोशी होय–पहेलां आपणे बधा जैन छीए. त्यारे तेने सन्तोष थयो.
अहीं आ प्रसंग एटला माटे रजु कर्यो छे के आपणा उगता बाळकोने जैनधर्मना
संस्कारनी केटली जरूरीयात छे–ते गंभीरपणे समाजना ध्यानमां आवे. “जैन छुं, ने जैन
एटले जिनवरनो सन्तान”–ए द्रढ संस्कार बाळपणथी ज आपवानी जरूर छे.
* माळीया (अमरापुर) थी बीपीन