: मागशर : २४९६ : २१ :
अतीन्द्रिय चैतन्यनो ज्यां उग्र स्पर्श–अनुभव कर्यो त्यां ईन्द्रियोनो विषय
जीताई गयो छे, अतिन्द्रय चैतन्यना स्पर्श वडे बाह्यमां स्पर्शन्द्रियनो आखो विषय
जीताई गयो छे, एटले शरीर उपर वस्त्र धारणनी वृत्ति ज रहेती नथी. आवी निर्ग्रंथ
मुनिदशा होय छे.
अनादि मिथ्याद्रष्टि जीव पण सम्यग्दर्शन पामीने ते ज अंतर्मुहूर्तमां सातमुं
गुणस्थान प्रगट करीने मुनि थाय छे. पण तेनेय निमित्तपणे तो निर्ग्रंथ द्रव्यलिंग
ज होय छे.–निमित्त एवुं ज होय छे, विपरीत होतुं नथी, अने छतां ते निमित्तना
आश्रये सातमुं गुणस्थान के मुनिपणुं प्रगट्युं छे–एम नथी. मुनिपणुं अथवा
सातमुं गुणस्थान तो चैतन्यमां उपयोगनी लीनताथी ज प्रगट्युं छे. पंचमहाव्रतनो
विकल्प पण ज्यां मुनिदशानुं कारण खरेखर नथी, त्यां जड शरीरनी नग्नदशानी शी
वात! एकला बहारथी लोकोए मुनिपणुं मानी लीधुं छे, पण सम्यग्दर्शन वगर
मुनिदशा होय नहि. सम्यग्दर्शन पछी पण ज्यां सुधी वस्त्रादिना परिग्रहनी वृत्ति
होय त्यां सुधी मुनिदशा होती नथी. चैतन्यमां लीनता थतां राग छूटे, ने राग
छूटतां निमित्त पण सहेजे छूटी जाय–एवो संबंध छे. पण वस्त्र छोडवानी क्रिया
आत्माए करी–एम नथी. वस्त्रनो त्याग थयो ते अजीवनी क्रिया छे; चारित्रदशा ते
संवर–निर्जरारूप धर्मक्रिया छे, ने राग ते विभाव क्रिया छे, आस्रव छे. ज्यां संवर–
निर्जरा प्रगट्या त्यां रागादि–आस्रव छूटी जाय छे, ने अजीवनो संबंध अजीवना
कारणे छूटी जाय छे.
चिदानंदस्वभाव आत्मा स्वसन्मुखपणे ऊपजतो थको रागादिनो अकर्ता छे, ते
अकर्तापणुं एटले के ज्ञायकस्वभावपणुं समयसारमां आचार्यदेवे स्पष्ट समजाव्युं छे.
जीव के अजीव बधाय द्रव्यो पोतपोतानी ज पर्यायरूपे ऊपजे छे; पोतानी ज पर्यायमां
तन्मयपणे ऊपजतो थको ज्ञायकस्वभावी जीव अन्य द्रव्यनो अकर्ता ज छे. सम्यग्द्रष्टि
जीव जाणे छे के वस्तुनुं स्वरूप सर्वज्ञदेवे जेम जाण्युं छे तेम ज परिणमे छे, तेमां
अन्यथा थतुं नथी. अहो, आमां तो ज्ञानस्वभावनो निर्णय छे, रागथी जुदो पडीने
ज्ञानस्वभावनी सन्मुखतानो मोटो पुरुषार्थ आमां रहेलो छे, ज्ञाननी दिशा स्व–तरफ
फरे छे; ने दिशा फरतां आखी दशा फरी जाय छे. हुं तो ज्ञ–स्वभावी छुं, परमां ईष्ट–
अनीष्ट मानवुं ते वृथा छे. आत्माना अनेक नामोमां ‘ज्ञ’ एवुं एक नाम छे. ‘ज्ञ’
स्वभाव जेमने पूर्ण प्रगटी गयो एवा सर्वज्ञ भगवान दिव्य ज्ञानसामर्थ्य वडे सर्व
पदार्थोने साक्षात् जाणे छे. आवा ज्ञानस्वभावनी कबुलात वगर ज्ञ–स्वभावी आत्माने
मान्यो