: जेठ : २४९६ आत्मधर्म : २९ :
६८. धर्मात्मा जाणे छे के हुं मारा चैतन्यरसथी सदाय भरेलो छुं. हुं एक छुं, मारा
स्वरूपमां मोह नथी; शुद्ध चेतनानो समुद्र ज हुं छुं आवा चैतन्यसमुद्रमां डुबकी
मारतां आनंदनुं वेदन थाय ने मोह टळे ते अपूर्व मंगळ छे.
६९. आनंदस्वरूप भगवान आत्माने स्पर्शीने जे अतीन्द्रिय आनंदनो अनुभव थाय
ते मंगळ छे.
७०. आत्मा परिपूर्ण ज्ञान–आनंदस्वभावी छे, सर्वे जीवो ज्ञानमय सिद्धसमान छे;
कोई जीव अधुरो नथी के बीजो तेने आपे. आवो आत्मा, तेनुं भान करतां जे
सम्यक् बीज ऊगी ते वधीने केवळज्ञान अने परमात्मदशारूपी पूर्णिमा थशे.
७१. आत्मा पामर रहेनारो नथी पण प्रभुताथी भरेलो छे; तेनुं भान करी आ
आत्माने परमेश्वर केम बनाववो तेनी आ वात छे
७२. समयसार एटले सर्वज्ञदेव पासेथी आवेलो ज्ञाननो दरियो! तेमां आत्माना
स्वभावनो अगाध महिमा भर्यो छे. एमां ऊंडो ऊतरे तो आत्माना परम
आनंदनो अनुभव थाय.
७३. दर्शन–ज्ञान–चारित्र ते आत्मामां नथी–एनो अर्थ ए छे के एवा त्रण भेद एक
आत्माना अनुभवमां नथी, अनुभवमां अभेद आत्मा छे. आवो अभेद आत्मा
ते हुं छुं एम धर्मी अनुभवे छे.
७४. वैशाख सुद त्रीजनी वहेली सवारमां जागतावेंत गुरुदेवना मुखमांथी आ शब्दो
नीकळ्या के–‘खोलो प्रभुजी! खोलो, आत्माना खजाना खोलो!’ अने पछी ए
पद गायुं के–
उपजे मोह–विकल्पथी समस्त आ संसार,
अंतर्मुख अवलोकतां विलय थतां नहीं वार.
७५. आ तो चैतन्यहीरानी अलौकिक वात छे. तेनुं श्रवण अने बहुमान करतां वच्चे
विकल्पथी जे पुण्य बंधाय ते पण बीजा करतां ऊंची जातना होय छे. पण
धर्ममां ते राग के पुण्यनी कांई किंमत नथी; आत्मानुं ज्ञान तो ते राग अने
पुण्यथी जुदुं छे.
७६. अविनाशी आत्माने विकारना फळरूप जे देहादिनो संयोग छे ते क्षणभंगुर