Atmadharma magazine - Ank 322
(Year 27 - Vir Nirvana Samvat 2496, A.D. 1970)
(Devanagari transliteration).

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श्रावण : २४९६ आत्मधर्म : २१ :
छुं,–एम नक्की करीने पर्यायने अंतर्मुख एकाग्र करीने द्रव्यनो आश्रय करे त्यारे अभेद–
अनुभव सहित साची प्रतीत ने परम आनंद थाय छे.
जे अवस्था पोते अंतर्मुख थईने श्रद्धानुं–अनुभवनुं काम करे छे, अने जेना
आधारे ते काम करे छे ते बंनेनुं स्वरूप जाण्या वगर नित्य–अनित्यरूप वस्तुनो
निर्णय थाय नहीं. द्रव्यपणे नित्य, पर्यायपणे अनित्य एवी वस्तु छे.–आवो
जैनमत छे.
पर्याय तो अनित्य छे, तेनो नाश थतां कांई आखी वस्तुनो अभाव थई जतो
नथी. द्रव्यपणे वस्तु टकी रहे छे. पर्याय–अपेक्षाए नाश थयो, पण द्रव्य–अपेक्षाए तो
वस्तु अविनाशी छे. वस्तु ज द्रव्यस्वरूपे नित्य टकती, पर्यायस्वरूपे उत्पाद–व्ययने करे
छे.–आम द्रव्यधर्म ने पर्यायधर्म–बंने धर्मवाळी वस्तु छे. एक्केने काढी नांखो तो वस्तुनुं
स्वरूप ज सिद्ध नहीं थाय. माटे एम समजवुं के–आत्माने एकांते नित्य के एकांते
अनित्य मानवो ते बंने भ्रम छे,–वस्तुस्वरूप नथी; अमे (जैनो) कथंचित् नित्य–
अनित्यात्मक वस्तुस्वरूप कहीए छीए ते ज सत्यार्थ छे. (स. कळश २०६ ना
प्रवचनमांथी)
हे जीव! जगतमां जे अनंत परवस्तुओ छे ते तारे माटे तो अवस्तु छे, एटले
तारे ताराथी भिन्न बीजी कोई जीव के अजीव वस्तुओ साथे काम नथी, तारे तारा द्रव्य
अने पर्याय साथे ज काम छे. द्रव्यधर्म छे ते पर्यायने करतो नथी, पर्यायनुं करवापणुं
वस्तुना पर्यायधर्मथी छे. वस्तुमां पर्याय छे ते पर्याय छे. ते द्रव्य छे ते द्रव्य छे; तेमां
द्रव्य ते पर्यायरूप नथी, पर्याय ते द्रव्यरूप थती नथी. आवी द्रव्य–पर्यायरूप बे
स्वभाववाळी वस्तु छे.–आनुं नाम अनेकान्त छे. वस्तुने द्रव्यअपेक्षाए नित्य–निष्क्रिय–
ध्रुव वगेरे कहेवाय छे, ने पर्यायअपेक्षाए तेने अनित्य–सक्रिय–उत्पादव्ययवाळी कहेवाय
छे.–एम बंनेनी अपेक्षा ध्यानमां राखीने द्रव्य–पर्यायनुं साचुं ज्ञान थाय छे. द्रव्य
अपेक्षाए नित्यपणुं देखनारने पर्याय पण ख्यालमां छे; तेमज पर्यायथी अनित्यपणुं
जाणनारने द्रव्यनो पण ख्याल छे. प्रवचनसारना २० मा बोलमां आत्माने
‘शुद्धपर्याय’ कह्यो,–पण ते शुद्धपर्याय अंदर ध्रुवना अवलंबने थई छे, एटले
‘शुद्धपर्याय’ कहेतां पण द्रव्य तो लक्षमां छे ज.–आमां परनी के विकारनी तो वात ज
नथी, आ तो पोतामां ने पोतामां द्रव्य ने पर्यायरूप