अनुभव सहित साची प्रतीत ने परम आनंद थाय छे.
निर्णय थाय नहीं. द्रव्यपणे नित्य, पर्यायपणे अनित्य एवी वस्तु छे.–आवो
जैनमत छे.
वस्तु अविनाशी छे. वस्तु ज द्रव्यस्वरूपे नित्य टकती, पर्यायस्वरूपे उत्पाद–व्ययने करे
छे.–आम द्रव्यधर्म ने पर्यायधर्म–बंने धर्मवाळी वस्तु छे. एक्केने काढी नांखो तो वस्तुनुं
स्वरूप ज सिद्ध नहीं थाय. माटे एम समजवुं के–आत्माने एकांते नित्य के एकांते
अनित्य मानवो ते बंने भ्रम छे,–वस्तुस्वरूप नथी; अमे (जैनो) कथंचित् नित्य–
अनित्यात्मक वस्तुस्वरूप कहीए छीए ते ज सत्यार्थ छे. (स. कळश २०६ ना
प्रवचनमांथी)
अने पर्याय साथे ज काम छे. द्रव्यधर्म छे ते पर्यायने करतो नथी, पर्यायनुं करवापणुं
वस्तुना पर्यायधर्मथी छे. वस्तुमां पर्याय छे ते पर्याय छे. ते द्रव्य छे ते द्रव्य छे; तेमां
द्रव्य ते पर्यायरूप नथी, पर्याय ते द्रव्यरूप थती नथी. आवी द्रव्य–पर्यायरूप बे
स्वभाववाळी वस्तु छे.–आनुं नाम अनेकान्त छे. वस्तुने द्रव्यअपेक्षाए नित्य–निष्क्रिय–
ध्रुव वगेरे कहेवाय छे, ने पर्यायअपेक्षाए तेने अनित्य–सक्रिय–उत्पादव्ययवाळी कहेवाय
छे.–एम बंनेनी अपेक्षा ध्यानमां राखीने द्रव्य–पर्यायनुं साचुं ज्ञान थाय छे. द्रव्य
अपेक्षाए नित्यपणुं देखनारने पर्याय पण ख्यालमां छे; तेमज पर्यायथी अनित्यपणुं
जाणनारने द्रव्यनो पण ख्याल छे. प्रवचनसारना २० मा बोलमां आत्माने
‘शुद्धपर्याय’ कह्यो,–पण ते शुद्धपर्याय अंदर ध्रुवना अवलंबने थई छे, एटले
‘शुद्धपर्याय’ कहेतां पण द्रव्य तो लक्षमां छे ज.–आमां परनी के विकारनी तो वात ज
नथी, आ तो पोतामां ने पोतामां द्रव्य ने पर्यायरूप