: आसो : २४९६ आत्मधर्म : २३ :
१२. विषयोथी जेमनुं चित्त विरक्त छे, शीलनी जेओ रक्षा करनारा छे, दर्शन जेमनुं
शुद्ध छे अने चारित्र जेमनुं द्रढ छे–एवा जीवो चोक्कस निर्वाणने पामे छे.
१३. विषयोमां मोहित होवा छतां जे पुरुष ईष्टदर्शी छे (पोतानुं ईष्ट शुं छे तेने जाणे
छे) तेने तो मार्गनी प्राप्ति कहेवामां आवी छे; परंतु जे उन्मार्गदर्शी छे तेनुं तो
ज्ञान पण निरर्थक छे.
१४. अनेकविध शास्त्रोने जाणता होवा छतां जे जीवो कुमत अने कुश्रुतना प्रशंसक
छे, तथा शील–व्रत ज्ञानथी रहित छे तेओ आराधक नथी.
१प. जे मनुष्य यौवन–लावण्य अने कांतिथी शोभायमान छे तथा सुंदर रूप वडे
गर्वित छे, पण जो शीलगुणथी रहित छे तो तेनो मनुष्यजन्म निरर्थक छे.
१६. व्याकरण–छंद–वैशेषिक–व्यवहार–न्यायशास्त्रो जाणीने, तेम ज जिनवाणीरूप
श्रुतने जाणीने पण, ते श्रुतमां शील ज उत्तम छे. (अर्थात् शीलसहित श्रुत होय
ते ज उत्तम छे.)
१७. जे शीलगुणथी मंडित होय ते देवोने तेम ज भव्यजीवोने वहालो लागे छे, दुःशील
जीव प्रचुर श्रुतनो पारगामी होय तोपण लोकमां ते अप्रिय छे, हलको छे.
१८. सर्वेथी जे परिहीन छे, रूप जेनुं विरूप छे अर्थात् कदरूप छे, सुवय जेनी वीती
गई छे अर्थात् वृद्धावस्था थई गई छे, परंतु शील जेनुं सुशील छे–तेनुं
मनुष्यजीवन उत्तम छे, प्रशंसनीय छे.
१९. जीवदया, इंद्रियदमन, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, संतोष, सम्यग्दर्शन, ज्ञान तेम ज
तप–ए बधा शीलनो परिवार छे.
२०. शील छे ते ज विशुद्ध तप छे, ते ज दर्शनशुद्धि छे, ते ज ज्ञानशुद्धि छे; वळी शील
ते विषयोनो शत्रु छे अने शील ते मोक्षनुं सोपान छे.
२१. जेम, स्थावर के जंगम एवा तीव्रविष वडे प्राणोओनो विनाश थाय छे तेम
विषयलुब्ध प्राणी तो सर्वस्वनो विनाश करे छे, माटे विष करतां पण विषयरूपी
विष वधु दारूण छे.
२२. सर्पादिकना विषनी वेदनाथी हणायलो जीव तो आ जन्ममां एक ज वार मरण
पामे छे, परंतु विषयरूपी विषथी अत्यंत हणायेलो जीव घोर संसार वनमां
भमतो थको अनंतवार मरे छे.
२३. विषयासक्त जीवो नरकमां वेदना पामे छे, तिर्यंचमां तथा मनुष्यमां पण दुःखो
पामे छे, अने देवलोकमां पण ते दुर्भाग्यने पामे छे.