Atmadharma magazine - Ank 356
(Year 30 - Vir Nirvana Samvat 2499, A.D. 1973)
(Devanagari transliteration).

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: १८ : आत्मधर्म जेठ : २४९९ :
धर्मी जो रागना फळने वांछतो नथी तो ते रागने शा माटे करे छे? एम प्रश्न
ऊठे तो तेनुं समाधान करतां आचार्यदेव (१५३मा कळशमां) कहे छे के–अरे जीव!
ज्ञानी राग करे छे एम तने तारी अज्ञानद्रष्टिथी ज देखाय छे; खरेखर ज्ञानी
ज्ञानभावपणे ज परिणमता थका ज्ञानना ज कर्ता छे, ते ज्ञानपरिणमनमां रगनुं
कर्तुत्व जरा पण नथी. ज्ञानपरिणमनमां आनंदनी ज धारा वहे छे. आवा ज्ञानी राग
करे छे के नथी करता–ए तने ज्ञान वगर क्यांथी खबर पडशे? ज्ञानी शुं करे छे! तेना
अंतरनी अज्ञानीने खबर पडे नहि. अहा, चैतन्यनो समुद्र उल्लसीने जेनी पर्यायमां
आनंदनी भरती आवी छे, जेणे रागादिभावोने चैतन्यसमुद्रथी बाह्य जाण्या छे–एवा
ज्ञानी रागने जरापण करे एम अमे तो देखता नथी. ज्ञानीमां अमने तो अतीन्द्रिय
ज्ञान ने आनंदनी ज धारा ऊछळती देखाय छे; राग तो ज्ञानथी बहार देखाय छे; ते
रागनुं कर्तृत्व ज्ञानीना ज्ञानमां नथी.–पण आवी भिन्नताने ज्ञानी ज ओळखी शके छे.
अहा, ज्ञानीनी ज्ञानदशामां तो अतीन्द्रिय आनंदना अनुभवनो सिक्को लागी गयो
छे; ए आनंदमां हवे राग केवो? सुखना वेदनमां दुःखनुं कर्तृत्व केवुं? आत्मानो
आवो स्वाद आवे त्यारे जीव धर्मी थयो कहेवाय, त्यारे ते ज्ञानी थयो, त्यारे ते साचो
जैन थयो, ने त्यारे ज ते खरेखर वीतराग भगवानना मार्गमां आव्यो. चोथा
गुणस्थाने गृहस्थने पण आत्माना आवा आनंदनो अनुभव होय छे.–आवा
धर्मीजीव पोताना ज्ञानने रागादिथी अत्यंत जुदुं ज जाणे छे, ते हवे कर्ता थईने रागने
करे के रागना फळने भोगवे–एम प्रतीत करी शकाती नथी. त्यां अवशपणे जे रागादि
थई जाय छे, ते कांई ज्ञाननो दोष नथी, ज्ञान कांई तेनुं कर्ता नथी. ज्ञान अने राग
साधकनी दशामां एकसाथे होय तेथी कांई तेमने कर्ता–कर्मपणुं थई जतुं नथी. बंने
साथे रहेवामां विरोध नथी, छतां तेमां ज्ञान तो मोक्षनुं ज कारण छे, ने राग ते बंधनुं
कारण छे.–आम ज्ञानीना वेदनमां बंनेनी अत्यंत भिन्नता सदाय वर्ते छे.
आवा भेदज्ञान पछी घणा गाढ आनंदमय स्वसंवेदनथी मुनिदशा प्रगटे छे.
भेदज्ञान वगर एकला द्रव्यलिंगरूप मुनिपणुं तो अनंतवार अज्ञानी जीवे पाळ्‌युं, पण
सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्ररूप भावलिंग कदी तेणे प्रगट कर्युं नथी. भावलिंग
एकजीवने वधुमां वधु ३२ वखत आवे,–पछी ते जरूर मोक्ष पामे. द्रव्यलिंग तो घणा
जीवोए अनंतवार धारण कर्युं ने अनंतवार नवमी ग्रैवेयक सुधी गया,–पण तेने
सम्यग्दर्शन वगर मोक्षनुं साधन जरापण न प्रगट्युं, ते सुख जरापण न पाम्यो;