: २० : आत्मधर्म जेठ : २४९९ :
ज्ञानी तो जगतनी अपेक्षा छोडीने, पोते शूरवीरपणे हरिना मारगने एटले के मोक्षना
मार्गने साधे छे. जगतनी सामे जोईने के रागनी सामे जोईने बेसी रहेवुं ए तो
कायरनुं काम छे, एवा कायर जीवो भगवानना मोक्षमार्गने साधी शकता नथी.
मोक्षमार्गने वीतरागभावथी साधवो ए तो शूरवीरोनुं काम छे. रागथी छूटो पडीने
पोते पोताना चैतन्यना आनंदने अनुभवमां लेवो–ए ते कांई रागनुं के विकल्पनुं
काम नथी, ए तो अंदर भेदज्ञानवडे रागथी छूटा पडीने चैतन्यना स्वसंवेदन वडे ज
थाय छे.–एवुं अपूर्व स्वसंवेदन करनार धर्मात्मा–ज्ञानीना अद्भुत कार्यने
कोई विरला ज ओळखे छे. ने एवी अद्भुत ज्ञानदशाने जे ओळखे छे ते पोते
रागथी भिन्न ज्ञानचेतनारूप थईने संसारना जन्म–मरणथी छूटी जाय छे.
• मुमुक्षुनी पात्रता •
दया शांति समता क्षमा,
सत्य त्याग वैराग्य.
होय मुमुक्षु घट विषे,
एह सदाय सुजाग्य.(आत्मसिद्धि)
जे जीव मुमुक्षु छे तेना अंतरमां सदाय दया शांति
समता क्षमा सत्य त्याग अने वैराग्यादि भावो होय छे. जे जीव
मुमुक्षु छे–जे शुभ रागने पण तोडीने परमवीतरागभावरूप
मोक्षने ईच्छे छे–तेने क्रोध केम गमे? तेने अशांति के असत्य
केम गमे? ज्यां वारंवार अंतरमां चैतन्यना अनुभव माटेनी
भावनाओ घूंटाय छे त्यां विषय–कषायना परिणामो एकदम
शांत थई जाय छे. क्रोधमां असत्यमां विषयोमां जेना परिणाम
लवलीन रहेता होय तेनामां मुमुक्षुता क्यांथी जागे?
अहा, मु... मु... क्षु एटले तो मोक्षनो पथिक! एना
परिणामोनो झुकाव संसार तरफ न होय, संसारथी विमुख
थईने चिदानंदस्वरूपने ज ते वारंवार भावे छे. ने. एवी उत्तम
भावना पासे अशुभपरिणाम बिचारा केम टकी शके? त्यां तो
परिणामोमां वैराग्य–कोमळता वगेरे पात्रता सहेजे होय छे.