
पर्युषणपर्वनी समाप्तिनी तैयारी हशे ने क्षमाभावनानुं सुंदर झरणुं आपणा सौना
हृदयमां वहेतुं हशे.
रहस्यो जिज्ञासुओ समक्ष आत्मधर्म द्वारा रजु थाय छे, ने जिज्ञासुओ परम प्रेमथी
तेनो लाभ ल्ये छे. परम गंभीर वीतरागीतत्त्वो आत्मधर्ममां रजु करतां, मारी
मंदबुद्धिने कारणे कोई क्षति थई गई होय, क्यांय अविनयादि भूलो थई गई होय तो
प्रभु पंचपरमेष्ठीभगवंतो प्रत्ये, परम माता जिनवाणी प्रत्ये, पू. गुरुदेव प्रत्ये, पूज्य
सर्वे संतो प्रत्ये अत्यंत नम्रतापूर्वक अंतरथी क्षमायाचना करुं छुं ने ते सौना चरणोमां
शिर झुकावीने भक्तिथी विनय करुं छुं. आ उपरांत कोई साधर्मीजनोनी लागणी
दुभावाई होय तो तेमना प्रत्ये पण वात्सल्यपूर्वक क्षमायाचना करुं छुं, ने मारा चित्तने
सर्वथा निःशल्य करुं छुं.
सोनेरी घडी गुरुदेवे आपणने आपी छे. आराधकजीवोनुं साक्षात् दर्शन अत्यारे आ
भरतक्षेत्रमां मळवुं– ए कोई परम सुयोग छे; गुरुप्रतापे मळेला आ सुयोगमां
धर्मात्मा–संतजनोना गंभीर चैतन्यगुणोने ओळखवा, ने पोतामां तेवा गुणनी
आराधना प्रगट करवी–ते ज आ सोनेरी–सुयोगनी सफळता छे.