Atmadharma magazine - Ank 359
(Year 30 - Vir Nirvana Samvat 2499, A.D. 1973)
(Devanagari transliteration).

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: ४० : आत्मधर्म : भाद्रपद र४९९ :
बंधुओ, आ लखाय छे त्यारे आपणे वीतरागधर्मनी आराधनारूप महान
पर्युषणपर्व आनंदथी उजवी रह्या छीए... अने ज्यारे आप आ वांचता हशो त्यारे
पर्युषणपर्वनी समाप्तिनी तैयारी हशे ने क्षमाभावनानुं सुंदर झरणुं आपणा सौना
हृदयमां वहेतुं हशे.
आत्मधर्मनुं संपादन हंमेशांं वीतरागीसंतो प्रत्येनी परमभक्ति अने साधर्मीओ
प्रत्येना हार्दिक वात्सल्यसहित ज थाय छे. गुरुदेवे आपणने समजावेला जैनशासनना
साचा रहस्यो–के जे रहस्यो समजतां जरूर आत्मतत्त्वनी अनुभूति थाय छे–ते ज
रहस्यो जिज्ञासुओ समक्ष आत्मधर्म द्वारा रजु थाय छे, ने जिज्ञासुओ परम प्रेमथी
तेनो लाभ ल्ये छे. परम गंभीर वीतरागीतत्त्वो आत्मधर्ममां रजु करतां, मारी
मंदबुद्धिने कारणे कोई क्षति थई गई होय, क्यांय अविनयादि भूलो थई गई होय तो
प्रभु पंचपरमेष्ठीभगवंतो प्रत्ये, परम माता जिनवाणी प्रत्ये, पू. गुरुदेव प्रत्ये, पूज्य
सर्वे संतो प्रत्ये अत्यंत नम्रतापूर्वक अंतरथी क्षमायाचना करुं छुं ने ते सौना चरणोमां
शिर झुकावीने भक्तिथी विनय करुं छुं. आ उपरांत कोई साधर्मीजनोनी लागणी
दुभावाई होय तो तेमना प्रत्ये पण वात्सल्यपूर्वक क्षमायाचना करुं छुं, ने मारा चित्तने
सर्वथा निःशल्य करुं छुं.
अहा, पर्युषण एटले आराधनानो मोटो उत्सव! बंधुओ, आपणे माटे तो
श्रीगुरुप्रतापे निरंतर पर्युषण जेवो ज अवसर छे... आत्मानी आराधना माटेनी
सोनेरी घडी गुरुदेवे आपणने आपी छे. आराधकजीवोनुं साक्षात् दर्शन अत्यारे आ
भरतक्षेत्रमां मळवुं– ए कोई परम सुयोग छे; गुरुप्रतापे मळेला आ सुयोगमां
धर्मात्मा–संतजनोना गंभीर चैतन्यगुणोने ओळखवा, ने पोतामां तेवा गुणनी
आराधना प्रगट करवी–ते ज आ सोनेरी–सुयोगनी सफळता छे.
बस, आराधना जयवंत हो.
(ब्र. ह. जैन)