PDF/HTML Page 21 of 53
single page version

आचार्यदेव कहे छे के देहना आश्रये मोक्षमार्ग नथी, आत्माना आश्रये
एम अमे जाणीए छीए, ने अमे पण आवो ज मोक्षमार्ग सेवीए छीए.
मोक्ष पाम्या? ते अमे अमारा स्वसंवेदनज्ञानथी जोईए छीए. स्वद्रव्याश्रित जे
सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र छे ते ज मोक्षमार्गपणे जोवामां आवे छे. अमे ते मार्ग जोयो
छे अने ते मार्गनी सेवना अमे करीए छीए.
सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र सेव्या ते अमे अमारा स्वसंवेदनभावथी बराबर जाणीए
छीए. पूर्वे कुंदकुंदाचार्यदेव वगेरे महान संतो थया तेओ वीतराग मोक्षमार्गने सेवनारा
हता–एम तेमनो निर्णय अत्यारे पण तेमनी वाणी उपरथी धर्मात्मा करी ल्ये छे.
लीधुं छे. कोई पण भगवंतो शरीरनी के रागनी सेवना करीने मोक्ष नथी पाम्या पण
अंदरमां ज्ञाननुं सेवन करीने सर्वे भगवंतो मोक्ष पाम्या छे. धर्मी प्रमोदथी कहे छे के
अहो! प्रभो! आपनो मुक्तिमार्ग अमे जाण्यो छे, ने अमे पण एवा ज मोक्षमार्गने
सेवीए छीए....आपना पगले–पगले मोक्षमां आवी रह्या छीए.–आम धर्मी जीव
निःशंक मोक्षमार्गने जाणे छे.
PDF/HTML Page 22 of 53
single page version

पर्याय छे. जेणे अंदरनी स्वानुभूति करी तेणे सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्रनुं सेवन कर्युं; ते
अनुभूति पोते आत्मा ज छे, आत्मा तेनाथी भिन्न नथी. आवा सम्यग्दर्शन–ज्ञान–
चारित्ररूप आत्मानुं सेवन, तेमां शुभराग नथी, तो पछी शरीरनी तो वात ज केवी?
तेमणे मोक्षमार्ग तरीके सेव्यो न हतो; माटे ज्ञानमय सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र ते ज
एक मोक्षमार्ग छे, शुभराग के शरीरना आश्रये मोक्षमार्ग नथी,–एम सूत्रनी अनुमति
छे. माटे बीजी बधी चिंता छोडीने एक ज्ञाननुं सेवन कर, ज्ञानना सेवन वडे
मोक्षमार्गमां तारा आत्माने जोड.
आवा मोक्षमार्गमां स्थाप!
तेमां ज नित्य विहार कर, नहि विहर परद्रव्यो विशे.
बधाय भगवंतोए मोक्ष माटे केवुं काम कर्युं हतुं? के रागरहित ज्ञानमय रत्नत्रयने
सेव्या हता. बधाय भगवंतोए सेवेलो आ ज एक मोक्षमार्ग छे, बीजो मार्ग मोक्ष माटे
छे ज नहीं.
उपदेश पण एम ज करी निर्वृत्त थया; नमुं तेमने.
बस लिंग छोडी ज्ञान ने चारित्र दर्शन सेवता.
PDF/HTML Page 23 of 53
single page version

चारित्र–दर्शन–ज्ञानने बस मोक्षमार्ग जिनो कहे.
भगवंतोए तो शरीरने मोक्षमार्ग नहीं जाणता थका तेनुं ममत्व छोड्युं ने रत्नत्रयना
सेवनवडे मोक्ष पाम्या. तुं पण तारा आत्माने आवा मोक्षमार्गमां जोड.–आ सिद्ध
भगवानना समाचार छे.
मोक्षमार्ग छे, परंतु एनाथी भिन्न एवुं द्रव्यलिंग (–नग्नशरीर के महाव्रतादिना
विकल्पो) ते कोई मोक्षमार्ग नथी.
उतारीने कहे छे के अहो! बधाय भगवान अर्हंतदेवोए आवा दर्शन–ज्ञान–
चारित्रनी ज मोक्षमार्गपणे उपासना करी छे–एम जोवामां आवे छे.
उपासनाथी मोक्षमार्ग साधी रह्या छीए, ने बधाय अर्हंत भगवंतोए पण आ ज रीते
मोक्षमार्गनी उपासना करी हती एम निःशंकपणे अमारा निर्णयमां आवे छे.
लिंगथी ज मोक्ष पामत!–परंतु अर्हंतभगवंतोए तो देहादिथी ने रागादिथी विमुख
थईने, शुद्धज्ञानमय चिदानंदतत्त्वनी सन्मुखता वडे दर्शन–ज्ञान–चारित्रनी ज उपासना
करी; माटे ए नक्की थयुं के देहमय लिंग ते मोक्षमार्ग नथी, राग पण मोक्षमार्ग नथी,
परमार्थे दर्शन–ज्ञान–चारित्रनी उपासना ते ज मोक्षमार्ग छे. दर्शन–ज्ञान–चारित्रनी
उपासना कई रीते थाय? के शुद्ध ज्ञानमय आत्माना सेवनथी ज ते रत्नत्रयरूप
मोक्षमार्गनी उपासना थाय छे.
PDF/HTML Page 24 of 53
single page version

भगवान अर्हंतदेवोने शुद्धज्ञानमयपणुं छे, ने तेओए द्रव्यलिंगना आश्रयभूत शरीरनुं
ममत्व छोडी दीधुं छे, एटले द्रव्यलिंगना त्यागवडे दर्शन–ज्ञान–चारित्रनी मोक्षमार्गपणे
उपासना जोवामां आवे छे. बधाय तीर्थंकरोए मोक्षमार्ग आ एक ज रीते उपास्यो छे,
एम अमारा जोवामां आवे छे.
होय. अने वळी कुंदकुंदाचार्यदेवने तो विदेहक्षेत्रमां साक्षात् तीर्थंकरभगवाननो भेटो पण
थयो हतो, आठ दिवस सुधी भगवान सीमंधर परमात्मानी सभामां दिव्यध्वनिनुं
साक्षात् श्रवण कर्युं हतुं, ज्यां अनेक केवळज्ञानी भगवंतो बिराजता हता, ज्यां
गणधरदेवो अने मुनिवरोनां टोळां आवा मोक्षमार्गने साधता हता,–तेमने नजरे
नीहाळीने, अने तेवो मोक्षमार्ग पोताना आत्मामां प्रगटावीने आचार्यदेव कहे छे के
भाई, मोक्षमार्ग तो आ शुद्ध ज्ञानमय आत्माना आश्रये रत्नत्रयनी उपासनाथी ज छे,
–एम अमारा जोवामां आवे छे, बीजो कोई मोक्षमार्ग अमारा जोवामां
आवतो नथी.
मोक्षमार्ग छे.
PDF/HTML Page 25 of 53
single page version

कांई मोक्षनुं कारण नथी.
छे....
ने ते जिनभगवंतोए बीजा मुमुक्षु श्रोताजनोने पण ए ज मोक्षमार्ग कह्यो.
धर्मीने आवे छे. श्रीमद् राजचंद्रजी पण दक्षिणदेशना पर्वतो नीहाळीने बहुमानथी कहे छे
अडोलवृत्तिथी उभेल पहाड नीरखी
स्वामी कार्तिकेयादि (मुनिओ)नी अडोल
वैराग्यमय दिगम्बरवृत्ति याद आवती
हती. ते स्वामी कार्तिकेयादिने नमस्कार.
रत्नत्रयरूप नौकावडे ते संसारने तरे छे माटे ते तीर्थ छे.
आवे छे.
PDF/HTML Page 26 of 53
single page version

होय ते आ नियमअनुसार ज मोक्षने साधी शके छे. ‘
जोईए. जे परिणामथी कर्म बंधाय ते परिणाम मोक्षनुं साधन नथी. आत्माना आश्रये
थता जे वीतरागी श्रद्धा–ज्ञान–चारित्ररूप परिणाम ते ज मोक्षनुं साधन छे. –ए नियम छे.
आत्माने जोड–एम सूत्रनी अनुभूति छे.
आश्रय करीने तेमां ज विहर! तुं तारा आत्माने स्वद्रव्यमां जोड.....तो तुं मोक्षमार्गमां
आव्यो–एम सूत्रनी अने संतोनी संमति छे.
नहि रही शको. मारा स्वसन्मुख अतीन्द्रिय ज्ञानचक्षुमां तो आप
साक्षात् बिराजी ज रह्या छो....आपना निःशंक श्रद्धा–ज्ञान वर्ते छे....
अंतरनयनो वडे हुं आपने देखी ज रह्यो छुं.
PDF/HTML Page 27 of 53
single page version

मार्ग गुरुदेवे आप्यो छे. परमागममंदिरनो महोत्सव नजीक आवी
रह्यो छे त्यारे वीरनाथनी परंपराना परमागममां कहेलो सत्य
मार्ग जाणीने मुमुक्षुओ आनंदित थशे.
वीतरागीसंतोए स्वानुभव करीने परंपरा टकावेलुं भावश्रुत, तेनो उपदेश आ
समयसारादि जिनागममां भर्यो छे; तेनाथी सूत्र अने अर्थ जाणीने, परमार्थमार्गनो
निश्चय करीने आजे पण भव्यजीवो मोक्षमार्गने पामे छे.
मोक्षमार्गनो परमार्थ उपदेश नथी, एटले एवा मार्गमां के एवा शास्त्रमांथी परमार्थ
मोक्षमार्ग शोधी शकाय नहीं. भाई, तारा हित माटे तुं साचा मार्गनो निर्णय कर, अने
ते साचो मार्ग बतावनारा वीतराग सर्वज्ञ देव–गुरु–शास्त्रने ओळखीने तेनी
परंपरानो स्वीकार कर.
PDF/HTML Page 28 of 53
single page version

निर्वाणने साधे छे.–आवो सत्य मार्ग कुंदकुंदाचार्यदेव वगेरे दिगंबर संतोए टकावी
राख्यो छे, ते आजे पण चाली रह्यो छे.
परमागमनी परंपरामां ज थाय छे. चैतन्यतत्त्व अने रागादितत्त्व बंने भिन्न छे–एवुं
भेदज्ञान करावीने रागने मटाडे छे,–ए रीते जीव परमागमनुं रहस्य जाणीने, मोक्षमार्ग
पामे छे.
परमागमनो अंश आजे पण विद्यमान छे. भगवाने कहेला बधा परमागम आजे भले
विद्यमान न होय, परंतु तेना एक अंशमां पण मोक्षमार्ग बताववानुं सामर्थ्य छे. भले
शास्त्रो थोडा छे, पण ते वीतरागीसंतोनी परंपराथी आवेला छे, तेमां वीतरागदेवे
कहेलो मूळमार्ग जळवाई रह्यो छे. अहो, दिगंबर आचार्योए मार्ग टकावीने अथाग–
अपार उपकार कर्यो छे.
वीतरागी परमागमनो अभ्यास करवो जोईए. महावीर भगवान मोक्ष पधार्या पछी
६२ वर्ष सुधी तो आ भरतक्षेत्रमां केवळज्ञाननी धारा अखंड रही. पछी केवळज्ञाननो
तो विच्छेद थयो पण बार अंगधारी पांच श्रुतकेवळीभगवंतो थया, तेमना द्वारा
श्रुतज्ञाननी धारा १०० वर्ष सुधी अखंड चाली. पछी श्रुतज्ञान पण क्रमेक्रमे घटवा
मांड्युं.–तोपण, घटतां–घटतां तेनो एक अंश आजेय वीतरागी संतोना प्रतापे
आपणने प्राप्त थाय छे...ते पण अमृत छे. तेना अभ्यास माटे प्रेरणा करतां वीरसेन
स्वामी (षट्खंडागम पुस्तक ९, पानुं १३३–१३४ मां) कहे छे के–
PDF/HTML Page 29 of 53
single page version

विरोधथी रहित छे, तेथी प्रमाणभूत छे. माटे मोक्षना अभिलाषी भव्यजीवोए आ
परमागमनो अभ्यास करवो जोईए.”
देव कहे छे के हे भाई! एवो विचार न कर. केमके अमृतना सो घडा पीवानुं जे फळ छे
ते फळ अमृतनो एक खोबो पीवामां पण प्राप्त थाय छे; तेम सर्वज्ञदेवनी परंपराथी
आवेल वीतराग–परमागमरूपी अमृत भले ओछुं होय तोपण तेना अभ्यासथी अपूर्व
आत्मकल्याणरूप मोक्षमार्गनी प्राप्ति थई शके छे.” माटे मोक्षार्थी जीवोए परमागमनो
अभ्यास जरूरी करवो.
छे ते जीव (सूत्र परोवेली सोयनी माफक) संसारमां खोवातो नथी, पण
संसारभ्रमणने छेदीने मोक्षदशाने पामे छे. भव पलटी जवा छतां ज्ञानधारा तूटया
वगर, ते अल्पकाळमां मोक्षने साधी लेशे.–एवो वीतरागी जिनसूत्रना सम्यग्ज्ञाननो
महिमा छे.
आत्मसत्ता प्रत्यक्ष अनुभवगोचर थाय छे. ते जीव संसारनी गतिमां रहेलो होवा छतां
संसारमां डुबतो नथी. चैतन्यतत्त्व अतीन्द्रिय छे, ईन्द्रियोथी अद्रश्य छे, छतां
जिनसूत्रना ज्ञानवडे तेनुं स्वरूप जाणीने स्वसंवेदनमां ते प्रत्यक्ष थाय छे. श्रुतज्ञाननी
ताकात कोई अद्भुत अपार छे. भावश्रुतज्ञान स्वसन्मुख थईने आत्माना स्वरूपने
वेदे छे, ते स्वसंवेदनमां सर्व आगमनो सार आवी जाय छे.
दिगंबर जैनआचार्योनी परंपराथी प्राप्त थाय छे. आवा जिनसूत्रने
PDF/HTML Page 30 of 53
single page version

भवनुं नाशक छे.
वीतरागवाणीनी शी अद्भुत रचना छे! एनुं ज्ञान करतां आनंदना तरंग ऊछळे छे.
मोक्षने पामतो नथी.
एकाद भवमां ते मोक्ष पामी जशे.–ए भावश्रुत ज्ञाननो महिमा छे.
ते जीव हवे मोक्ष पामशे, तेणे ज खरी दीपावली करी. ज्ञानना महिमापूर्वक गुरुदेव कहे
छे के अहो! आवुं अपूर्व सम्यग्ज्ञान बतावनारां जिनसूत्रो (समयसारादि) अहीं
परमागममंदिरमां कोतराई गयां, तेमां आखा समाजना पुण्य भेगां छे. बेन जेवा
आत्माओनां तो पुण्य छे ज, ने आखा समाजना पण महा भाग्य छे के आ काळे
आवा परमागम प्रसिद्धिमां आव्या! (गुरुदेवनी आ वात श्रोताजनोए हर्षपूर्वक
वधावी लीधी, ने कह्युं के अहो गुरुदेव! आ बधो आपनो ज प्रताप छे.)
शुद्धआत्मा उपादेय छे, तेना आश्रये संवर–निर्जरा–मोक्षदशा प्रगटे छे. शुद्ध आत्मानी
मुख्यताथी अध्यात्मनुं निरूपण छे.
PDF/HTML Page 31 of 53
single page version

जे ज्ञान–आनंदमय अतीन्द्रियभाव प्रगट्यो ते ज जीवनुं साचुं जीवन छे. आवुं जीवन
धर्मी जीवे छे, ने जगतने पण तेवा ज जीवननो उपदेश आपे छे.–आवुं जीवन जीववुं–
ते महावीरनो सन्देश छे. जे जीवनमां आत्मानी शांति आवे ने जेना फळमां मोक्ष थाय,
ए ज साचुं जीवन छे. अन्न–वस्त्र के ईन्द्रियोने आधीन जीववुं ए कांई साचुं जीवन
नथी.
उपर आव्यो ने लीलफूगना पडमां तीराड पडतां उपर पूनमनो झगझगतो चंद्र जोयो.
आश्चर्यथी ते बीजा काचबाने तेडवा गयो ने कह्युं के में कंईक अद्भुत वस्तु जोई, चालो
तमने बतावुं. बधा काचबा पाणी उपर आव्या, पण त्यां तो लीलफूगनुं पड पाछुं भेगुं
थई गयुं हतुं एटले चंद्र न देखायो; बीजा काचबा कहेवा लाग्या के तें कांई जोयुं नथी, तुं
जूठुं कहे छे; तें जोयुं होय तो अमने बताव! पहेलो काचबो मनमां समज्यो के में तो
अपूर्व वस्तु जोई छे पण आ लोकोने कई रीते बतावुं! तेम धर्मी जीव अनंतकाळना
मोहनो पडदो चीरीने पोताना अतीन्द्रिय चैतन्यतत्त्वना दर्शनथी महा आनंदित थाय
छे. बीजा जीवोने पण कहे छे के आत्मा ईन्द्रियातीत महा आनंदथी भरेल तत्त्व छे, तेने
देखतां महा आनंद थाय छे. पण ईन्द्रियज्ञान द्वारा जीवो तेने देखी शकता नथी एटले
तेने तेनो विश्वास आवतो नथी; ते कहे छे के अमने तो आत्मानो आनंद कंई देखातो
नथी, तमे देख्यो होय तो अमने बतावो. ज्ञानी अंतरमां समजे छे के में तो
स्वानुभवथी अंतरमां चैतन्यवस्तुने साक्षात् जोई छे, तेना अतीन्द्रिय आनंदनो अपूर्व
स्वाद चाख्यो छे, पण बीजा ईन्द्रियज्ञानवाळा जीवोने ते कई रीते बतावुं? मोहनो
पडदो दूर करी चैतन्यआंख खोलीने पोते जुए तो आत्माना अपार महिमानी खबर
पडे. परमागम तो आत्माना महिमाने प्रसिद्ध करी–करीने बतावे छे.
PDF/HTML Page 32 of 53
single page version

जुदी वस्तु नथी.–आवी अनुभूति करवी ते परमागमनुं फरमान छे.
भेदज्ञान वडे रागथी भिन्न, ईन्द्रियोथी भिन्न, अतीन्द्रिय चैतन्यवस्तुनी अनुभूतिरूप
जीवन ते ज आत्मानुं साचुं जीवन छे, ते साचो आत्मा छे; तेमां जन्म–मरणना दुःखनो
अभाव छे; ते चैतन्यजीवन आनंदथी भरेलुं छे. भाई, जैन थईने तुं एक वार आवुं
वीतरागी जीवन जीवतां शीख. तने महा आनंद थशे. वीतरागी संतो अने अरिहंतो–
सिद्धो आवुं वीतराग–चैतन्यजीवन जीवे छे, ते ज साचुं जीवन छे.–
कोई साधननी (धननी के अन्ननी) जरूर पडती नथी. ते जीवन चैतन्यप्राणथी जीवाय
छे; ते ज आनंदमय सत्य जीवन छे. ते ज प्रभु महावीरनो संदेश छे. आवुं अतीन्द्रिय
आनंदमय चैतन्यजीवन अमे जीवीए छीए–अने तमे पण एवुं आनंदमय
चैतन्यजीवन जीवो–एम सिद्धप्रभुना समाचार छे.
आवो मोक्षमार्ग शुद्धात्माना आश्रये अत्यारे आ भरतक्षेत्रे पंचमकाळमां पण थई शके
छे. आत्माथी ‘न थई शके’ एवुं भगवानना शासनमां छे ज नहि. हकार लावीने करे
तो अत्यारे पण मोक्षमार्ग थाय छे. अनेक जीवो आत्मानो अनुभव करीने मोक्षमार्गने
पामेला अत्यारे पण विद्यमान छे. माटे तुं पण तारा आत्माने उत्साहथी मोक्षमार्ग–
पर्यायमां जोड. ए वीरनो मार्ग छे. शूरवीर थईने तुं वीरना मार्गमां आवी जा. तने
अपूर्व आनंदजीवन प्राप्त थशे.
PDF/HTML Page 33 of 53
single page version

आत्माने सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्रस्वरूप मोक्षमार्गमां स्थाप!
तेमां ज नित्य विहार कर, नहि विहर परद्रव्यो विषे.
PDF/HTML Page 34 of 53
single page version

मोक्षपंथमां तुं परिणमाव.
‘आ पर्याय ने आ द्रव्य’ एवा विकल्पो नथी, भेद नथी. जे आवी अनुभूति करे तेणे
पोताना आत्माने मोक्षमार्गमां स्थाप्यो छे.
रत्नत्रयनी मोक्षमार्गपर्यायरूपे तारा आत्माने परिणमावीने तेमां ज आत्माने स्थाप.
पहेलांं बीजी गाथामां, ‘दर्शन–ज्ञान–चारित्रमां जे स्थित छे ते स्वसमय छे’ एम कह्युं
तेनो ज आ उपदेश छे.
नवी–नवी सम्यक्त्वादि निर्मळपर्यायरूपे ज परिणम्या करे छे एटले ते आत्मा
मोक्षमार्गमां ज निश्चल रहे छे; तेथी तेणे मोक्षमार्ग पर्यायमां पोताना आत्माने निश्चल
स्थाप्यो छे.
वळ.
संसारमां रखड्यो ते पोताना दोषथी; दोष केटलो?–के परद्रव्यने पोतानुं मान्युं
वाळीने मोक्षपंथमां स्थापे छे. अनादिथी बंधमार्गमां रह्यो होवा छतां
PDF/HTML Page 35 of 53
single page version

स्थापी शके छे. माटे हे भाई! एक वार तो जगतनो पाडोशी थईने अंतरमां आत्माने
देख! तने कोई अपूर्व आनंदनो अनुभव थशे.
बीजी बधी चिंताने दूर करीने तारा चिदानंदस्वरूपने एकने ज ध्येय बनावीने तेने ज
ध्याव. जगत आखाथी उदास थई जा ने एक आत्माना मोक्षमार्गमां ज उत्साहित
थईने तेमां ज आत्माने स्थाप. तेनुं ज ध्यान कर...तारा आत्माने स्वतंत्रपणे ज तुं
मोक्षमार्गमां स्थाप....बीजा कोईनो तेमां सहारो नथी. रागने एकमेक करीने तारा
आत्माने न ध्याव, पण सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्ररूप निर्मळपर्यायोमां एकमेक करीने
तारा आत्माने ध्याव. आ रीते निर्मळपर्यायनी साथे आत्माने अभेद करीने कह्युं छे.
पण कह्युं हतुं के, हुं मारा समस्त निजवैभवथी–आत्मवैभवथी शुद्धआत्मानुं स्वरूप
दर्शावुं छुं अने तमे तमारा स्वानुभवप्रमाणथी जाणीने ते प्रमाण करजो.–सामा शिष्यनी
एटली लायकात जोईने आचार्यदेवे आ वात करी छे.
चेतनारूप थईने तुं मोक्षमार्गने चेत, तेनो अनुभव कर...ने रागनो अनुभव न कर.
आत्माना स्वभावनो आश्रय करतां जे निर्मळपरिणाम थाय छे ते निर्मळ–परिणाममां
ज तुं विहर, परद्रव्याश्रित थता एवा रागादि परिणाममां तुं जरापण न विहर...आ ज
मोक्षनो पंथ छे. आ ज महावीरनो मार्ग छे.
PDF/HTML Page 36 of 53
single page version

प्रवचन परमागम–मंदिरमां थयुं हतुं; ते तथा आसो वद चोथना
मंगल दिवसनुं प्रवचन अहीं आप्युं छे. परमागम–मंदिरमां
प्रवचन करतां जैनदर्शनना अगाध महिमाने प्रसिद्ध करीने प्रमोद–
पूर्वक गुरुदेव कहे छे के–अहो, जैनदर्शन! अने तेमां पण
सम्यग्दर्शननो महिमा! एनी शी वात? ज्यां आत्मानो प्रेम थयो
त्यां आखा जगतना बधा पदार्थोमांथी एनो रस ऊडी जाय, ने
अंदर चैतन्यस्वरूपनो अतीन्द्रिय स्वाद आवे.
कर्यो छे. तीर्थंकर भगवंतो मुनिदशामां केवळज्ञान थया पहेलांं उपदेश देता नथी, मौन ज
रहे छे; केवळज्ञान थया पछी ज समवसरणमां प्रभुनो उपदेश नीकळे छे. पोतानुं काम
पूरुं करीने पछी प्रभुनो उपदेश नीकळ्यो. ते उपदेशने अनुसरीने संतोए जे वाणी रची
ते आ समयसारादि परमागम छे. तेमां सम्यग्दर्शननो प्रधान उपदेश छे.
निर्णय कर. जेमां मननो, रागनो के ईन्द्रियनो संबंध नथी एवा आत्मानी सन्मुख थईने
PDF/HTML Page 37 of 53
single page version

सारभूत रत्नत्रय, तेमां पण सम्यग्दर्शन प्रथम मुख्य छे, ते मोक्षनुं प्रथम पगलुं छे.
शुभराग ते मोक्षनुं पगलुं नथी, सम्यग्दर्शन ते मोक्षनुं प्रथम सोपान छे. ए सम्यग्दर्शन
वगर शुभरागनी बधी क्रियाओ धारण करे तो पण तेमां कांई परमार्थ नथी. राग ते
कांई चैतन्यनो अंतरंगभाव नथी. सम्यग्दर्शन ते चैतन्यनो अंतरंगभाव छे. तेथी कहे
छे के–
सम्यकता न लहे, सो दर्शन धारो भव्य पवित्रा.
छे, हे भाई! रागनी क्रियामां के शास्त्रना एकला जाणपणामां सम्यग्दर्शन नथी,
चैतन्यनी अनुभूतिथी ते बाह्य छे. तेनाथी पार अंतरंग चैतन्यनी अनुभूति करे तो ज
सम्यग्दर्शन थाय छे. सम्यग्दर्शन ते मोक्षमार्गनुं कर्णधार छे.
मार्गमां जेवा सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र कह्यां छे तेवा ज ओळखीने तेनी श्रद्धा बराबर
करजे. तेमांथी अत्यारे ताराथी थाय एटलुं तो चारित्र पण करजे. करवा जेवी तो पूर्ण
वीतराग–चारित्रदशा छे. पण तेम न थई शके ने राग रही जाय, तो ते रागने धर्म न
मानीश, रागने मोक्षनो मार्ग न मानीश. वीतरागमार्गनी श्रद्धा छोडीने जो रागने धर्म
मानीश तो तने मिथ्यात्व थशे. वीतरागमार्गनी श्रद्धा राखीश तो तारुं सम्यग्दर्शन अने
आराधकपणुं टकी रहेशे.
श्रद्धा राखीने ताराथी थाय तेटलुं करजे, ने बीजानी भावना राखजे. निर्ग्रंथ मुनिपणुं
पोताथी न पळाय तो कांई वस्त्रसहित मुनिपणुं न मनाय. जो वस्त्रसहित मुनिपणुं
मानीश तो तीर्थंकरोनी विराधना थशे, ने वीतरागमार्गथी तुं भ्रष्ट थई जईश. बापु!
जैनमार्गमां रागनो सूक्ष्म कण पण न पालवे, एटले के रागनो कोई कण मोक्षमार्ग
तरीके न मनाय.
PDF/HTML Page 38 of 53
single page version

करजे. न थई शके तो श्रद्धा राखजे पण बीजुं मानीश मा; मार्गने बगाडीश मा.
चारित्रदोष होय तेने चारित्रदोष तरीके जाणजे; पण ते दोषने मार्गमां खतवीश नहि.
मार्ग तो जेम छे तेम राखजे.
चैतन्यनी शांतिनी जात नथी. समकिती पण पोतानी अवस्थामां जेटला रागादि भावो
छे तेने दोष तरीके जाणे छे. ज्ञानधारामां रागधाराने भेळवता नथी. जेटली ज्ञानधारा
छे तेने तो मोक्षमार्ग जाणे छे अने जेटली रागधारा छे तेने बंधमार्ग जाणे छे.
ज्ञानधारामां चैतन्यस्वादनुं वेदन छे; ते वेदन कांई रागधारामां नथी. रागधारामां तो
दुःखनुं वेदन छे. चैतन्यना स्वादनी मधुरता पासे जगतनो रस धर्मीने ऊडी गयो छे.
सम्यग्दर्शनमां आवो चैतन्यस्वाद छे. आवा सम्यग्दर्शनने हे जीव! तुं अत्यंत भक्तिथी
धारण कर. ते उपरांत सम्यक् चारित्रनुं पण जेटलुं पालन थई शके तेटलुं जरूर कर.
आवो उपदेश भगवान केवळी–जिनदेवना मार्गमां छे. अहो, आवो सुंदर मार्ग! तेने
पामीने हे जीव! तुं बीजा मिथ्यामार्ग सामे जोईश नहीं.
होय तोपण सम्यग्दर्शन धर्मीने होय छे. हा, सम्यग्दर्शननी साथे सम्यग्दर्शनने योग्य
चारित्र (कुदेव–कुगुरु–कुधर्मनो त्याग, अभक्ष्य भक्षणनो त्याग वगेरे आचरण) जरूर
होय. पण सम्यग्दर्शन वगर सम्यक्चारित्रदशा तो कदी न होय. सम्यग्दर्शनसहित
सम्यक्चारित्रदशा पण होय तो–तो मोक्षमार्गमां ते खूब शोभी ऊठे छे, ते तो उत्तम छे.
पण कोईने तेवी चारित्रदशा न होय तो तेथी कांई तेना सम्यग्दर्शननी किंमत घटी न
जाय. सम्यग्दर्शन वडे पण तेनुं आराधकपणुं बराबर टकी रहेशे. माटे हे जीवो! तमे
भावथी आवा उत्तम सम्यग्दर्शनने धारण करो.
सम्यग्दर्शननी किंमत करवा मांगे छे तेणे सम्यक्त्वना अपार महिमानी खबर नथी. अरे,
PDF/HTML Page 39 of 53
single page version

नीकळ्यो; स्वर्गना ईन्द्र पण ते सम्यक्त्वनी प्रशंसा करे छे. चारित्रदशावंत मुनिना
सम्यग्द्रष्टिजीव कल्याणनी परंपरा सहित उत्तम मोक्षसुखने पामे छे.
अतीन्द्रिय महिमारूप सम्यग्दर्शनवडे ते परंपरा अक्षय सुखरूप मोक्षने पामे छे.
छे–तेनी ओळखाण करे तो मनुष्यपणुं पामवानी सफळता छे.
मंदिर तो आत्मा छे; तेने श्रद्धामां लेतां अपूर्व आनंद थाय छे. ते सम्यग्द्रष्टिजीव
PDF/HTML Page 40 of 53
single page version
