Atmadharma magazine - Ank 378
(Year 32 - Vir Nirvana Samvat 2501, A.D. 1975)
(Devanagari transliteration).

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: चैत्र : २५०१ आत्मधर्म : १७ :
* प्रणमन करुं हुं धर्मकर्ता तीर्थ श्री वर्द्धमानने *
जिज्ञासुनुं प्रथम कर्तव्य–आत्मतत्त्वनो निर्णय
[सम्यक्त्व–जीवन लेखमाळा: लेखांक – ११]
सुख कहो के सम्यक्त्व कहो–ते जीवने वहालुं छे.
जेमां सुख भर्युं छे. एवा पोताना ज्ञानस्वरूपनो साचो
निर्णय ज्ञानवडे करवो ते ज सम्यक्त्वनी रीत छे. जेणे
एवो निर्णय कर्यो तेने पात्रता थई ने तेने अंतरमां
अनुभव थशे ज.

सम्यग्दर्शन थतां पहेलांं संसार–दुःखोथी त्रासीने आत्मानो आनंद प्रगट करवा
माटेनी भावना जागे छे.
हे भाई! तारे सुखी थवुं छे ने?–तो तुं तारा साचा स्वरूपने ओळख, –के जेमां
खरेखर सुख भर्युं छे. आत्माना स्वरूपनो पहेलांं साचो निर्णय करवानी वात छे. अरे,
तुं छो कोण? शुं क्षणिक पुण्य–पापनो करनार ते ज तुं छो? ना, ना, तुं तो ज्ञान करनार
ज्ञानस्वभावी छो. परने ग्रहनार के छोडनार तुं नथी, चेतकभाव ज तुं छो. आत्मानो
आवो निर्णय ते ज धर्मनी पहेली शरूआतनो (सम्यग्दर्शननो) उपाय छे. आवो
निर्णय न करे त्यांसुधी सम्यग्दर्शननी पात्रतामां पण नथी. मारो सहज स्वभाव
जाणवानो छे–आवो ज्ञानस्वभावनो निर्णय श्रुतज्ञानना बळथी थाय छे, ने ते ज
सम्यक्त्वनी रीत छे. जेणे ज्ञानमां साचो निर्णय कर्यो तेने पात्रता थई, ने तेने अंतरमां
अनुभव थवानो ज छे. माटे तत्त्वनिर्णय ते जिज्ञासु जीवनुं प्रथम कर्तव्य छे.
हुं ज्ञानस्वभावी जाणनार छुं, ज्ञेयमां क्यांय राग–द्वेष करीने अटकवुं तेवो मारो
ज्ञानस्वभाव नथी. पर गमे तेम हो, हुं तो तेनो मात्र जाणनार छुं, मारो जाणनार
स्वभाव परनुं कांई करनार नथी; पण ज्ञानस्वभाव साथे मारामां श्रद्धा–शांति–आनंद
वगेरे अनंत स्वभावो छे. हुं जेम ज्ञानस्वभावी छुं तेम जगतना बधा आत्माओ
ज्ञानस्वभावी छे; तेमां तेओ पोते पोताना ज्ञानस्वभावनो निर्णय करीने ज्ञानभावरूपे