Atmadharma magazine - Ank 378
(Year 32 - Vir Nirvana Samvat 2501, A.D. 1975)
(Devanagari transliteration).

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: १८ : आत्मधर्म : चैत्र : २५०१
* असीम ज्ञानादि गुणधारी जितभव महावीर–जिनने वंदन *
परिणमे–तो ज तेमनुं दुःख टळे ने तेओ सुखी थाय. परजीवोनुं दुःख कोई मटाडी शके
नहि; केमके दुःख तेओए पोतानी भूलथी ऊभुं कर्युं छे, अने तेओ पोते पोतानी भूल
टाळे तो तेमनुं दुःख टळे. कोई परना लक्षे अटकवानो ज्ञाननो स्वभाव नथी.
अरे जीव! अत्यारसुधी पोताना सुखने भूलीने तें परमां सुख मान्युं....तुं
ते पात्र जीवे श्रुतज्ञानना अवलंबनथी आत्माना ज्ञानस्वभावने अव्यक्तपणे
लक्षमां लीधो छे, एटले स्वभावसन्मुख झुक््यो छे,–सम्यक्त्वसन्मुख थयो छे;
परिणामना प्रवाहनी दिक्षा फरी छे; ते अंतरमां आगळ वधीने अनुभव करे छे एटले
आत्मसाक्षात्कार अर्थात् सम्यग्दर्शन थाय छे. ते माटे ते जीव शुं करे छे? आत्मानी
प्रगट प्रसिद्धिने माटे ईन्द्रिय अने मनद्वारा पर तरफ प्रवर्तती बुद्धिओने पाछी वाळीने
ज्ञानने आत्मामां लई जाय छे, एटले उपयोगने आत्मसन्मुख करे छे, त्यां साक्षात्
निर्विकल्प अनुभूतिमां भगवान आत्मा प्रसिद्ध थाय छे. ज्ञान वडे जे अप्रगटरूप
निर्णय कर्यो हतो तेनुं आ फळ आव्युं एटले के प्रगटरूप स्वानुभव थयो.
ज्ञानस्वभावनो निर्णय करे त्यां आवुं फळ आवे ज.