१७४
स्वक्षेत्रमां रहीने लोकालोकने जाणनारुं आश्चर्यकारक, स्वपरप्रकाशक प्रत्यक्षज्ञान तेमने प्रगट थयुं, आत्माना असंख्य प्रदेशोमां आनंदादि अनंत गुणोनी अनंत पूर्ण पर्यायो प्रकाशी नीकळी.
अत्यारे आ पंचम काळे भरतक्षेत्रमां तीर्थंकर- भगवानना विरह छे, केवळज्ञानी पण नथी. महाविदेह- क्षेत्रमां कदी तीर्थंकरनो विरह पडतो नथी, सदाय धर्मकाळ वर्ते छे. आजे पण त्यां भिन्न भिन्न विभागमां एक एक तीर्थंकर थईने वीश तीर्थंकर विद्यमान छे. हालमां विदेहक्षेत्रना पुष्कलावतीविजयमां श्री सीमंधरनाथ विचरी रह्या छे अने समवसरणमां बिराजी दिव्यध्वनिना धोध वरसावी रह्या छे. ए रीते अन्य विभागोमां अन्य तीर्थंकरभगवंतो विचरी रह्या छे.
जोके वीरभगवान निर्वाण पधार्या छे तोपण आ पंचम काळमां आ भरतक्षेत्रे वीरभगवाननुं शासन प्रवर्ती रह्युं छे, तेमनो उपकार वर्ती रह्यो छे. वीरप्रभुना शासनमां अनेक समर्थ आचार्य- भगवंतो थया जेमणे वीरभगवाननी वाणीनां रहस्यने विधविध प्रकारे शास्त्रोमां भरी दीधां छे. श्री कुंदकुंदादि समर्थ आचार्यभगवंतोए दिव्यध्वनिनां ऊंडां रहस्योथी भरपूर परमागमो रची मुक्तिनो मार्ग अद्भुत रीते प्रकाश्यो छे.