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पर्याय स्वतंत्र है इसलिये उसे कोई बना नहीं देता। पर्याय स्वतंत्र प्रगट होती है। पर्यायकी स्वतंत्रता बतानेके लिये उसके षटकारक भी स्वतंत्र (कहनेमें आते हैं)। वह भी एक अपेक्षा है। पर्यायकी स्वतंत्रता है वह जाननेके लिये एक अपेक्षासे कहनेमें आता है।
मुमुक्षुः- प्रवचनसारमें आया न कि द्रव्य, गुण और पर्याय तीनों सत हैं। तो ये..
समाधानः- हाँ, तीनों सत हैं। इसलिये तीनों स्वतंत्र हैं।
मुमुक्षुः- तीनों स्वतंत्र।
समाधानः- तीनों स्वतंत्र हैं। लेकिन उसकी अपेक्षा जाननी चाहिये।
मुमुक्षुः- यानी है द्रव्यके आधारसे।
समाधानः- हाँ, द्रव्यके आधारसे है। द्रव्यका आधार समझना चाहिये। नहीं तो पर्याय निराधार नहीं होती।
मुमुक्षुः- स्वयं ही आत्माको जाननेका कार्य करे और आत्माके सन्मुख होकर करे और परसे विमुख होकर। तो शान्ति, आनन्द जो प्रगट हुआ उसे ही वेदन कहते हैं?
समाधानः- उपयोग स्वका... क्या कहा? पर-ओरसे उपयोग हटकर स्वसन्मुख होवे, परकी सन्मुखता तोड दे और स्वसन्मुख उपयोग होवे, उपयोग आत्मामें लीन हो जाय और विकल्प टूट जाय, उपयोग स्वरूपमें आये, विकल्प टूट जाय, विकल्पकी आकूलता टूट जाय, उसका भेदज्ञान हो जाय, आत्मा आत्माकी ओर सन्मुख हो जाय, आत्मामेें उपयोग लीन हो जाय तो आत्मामें उसका जो स्वभाव है-आनन्द आदि अनन्त गुण है वह प्रगट होते हैं। उसको आत्माकी स्वानुभूति और वेदन कहनेमें आता है। उपयोग परसे छूट जाय।
मुमुक्षुः- तो उसमें बार-बार स्थिरता क्यों नहीं होती?
समाधानः- क्या बार-बार?
मुमुक्षुः- स्थिरता क्यों नहीं होती?
समाधानः- स्थिरता तो उसकी जो दशा जितनी होवे वैसे होवे। क्योंकि उपयोग तो बाहर चले। अंतर्मुहूर्तकी उसकी स्थिति है। अंतर्मुहूर्तिकी स्थिति है उपयोगकी। अंतर्मुहूर्त स्वानुभूतिमें स्थिर होकर उपयोग बाहर जाता है। स्थिरता तो चारित्रदशाकी कमी है इसलिये स्थिरता नहीं होती है। स्वरूपकी परिणति ज्ञायककी धारा रहती है। ज्ञायककी भेदज्ञानकी धारा रहती है। अमुक अंशमें स्थिरता होती है। स्थिरता नहीं होता है, ऐसा नहीं। उसमें एकमेक नहीं हो जाता है। एकत्वबुद्धि नहीं होती। ज्ञायककी ज्ञाताधार और कर्मकी