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चैतन्य तत्त्व ही हूँ। विशेष भेदभाव गौण करके शुद्धात्माकी पर्याय प्रगट होती है। विभावकी पर्याय गौण हो जाती है। मैं चैतन्य शुद्धात्मा हूँ, ऐसी प्रतीत तो दृढ करनी चाहिये, ऐसा ज्ञान करना चाहिये, उसकी लीनता होनी चाहिये। तो स्वानुभूति होती है। बारंबार मैं ज्ञायक हूँ, ज्ञायक हूँ, ऐसा विचार करके, लक्षण पहचानकर (आगे बढना)। यथार्थ पीछान होवे तो भी उसका अभ्यास करना चाहिये। ये अच्छा नहीं है, मैं चैतन्य ज्ञायक हूँ। सामान्य स्वरूप अनादिअनन्त (हूँ)। गुणका भेद, पर्यायका भेद पर दृष्टि नहीं करके, मैं चैतन्य हूँ। उसमें गुण है, पर्याय है तो भी दृष्टि तो अखण्ड पर रखनी चाहिये। ज्ञान सबका होता है, परन्तु दृष्टि एक अखण्ड चैतन्य सामान्य पर होती है। द्रव्यदृष्टिके बल-से उसमें लीनता (होती है)।
दृष्टि-सम्यग्दर्शन होने-से सब नहीं हो जाता है। लीनता-चारित्र, स्वरूप रमणता- लीनता बाकी रहता है। मुनिओं छठवें-सातवें गुणस्थानमें झुलते हैं। लीनता विशेष हो जाती है। सम्यग्दृष्टिको इतनी लीनता नहीं होती। तो भी उसको स्वानुभूति होती है। स्वरूपाचरण चारित्र होता है। भेदज्ञानकी धारा चलती है। स्वानुभूति-से बाहर आवे तो भेदज्ञानकी धारा क्षण-क्षण, क्षण-क्षण, क्षण-क्षणमें खाते-पीते, जागते, स्वप्नमें भेदज्ञानकी धारा (चलती है)। ज्ञायकधारा और उदयधारा दोनों भिन्न चलती है। कोई-कोई बार स्वानुभूति होती है। निर्विकल्प स्वानुभूति-से बाहर आवे तो भेदज्ञानकी धारा (चलती है)।
उसके पहले उसकी महिमा करनी चाहिये, उसकी लगनी करनी चाहिये, तत्त्वका विचार करना चाहिये, आत्माका स्वभाव पहचानना चाहिये। आत्माका ज्ञान लक्षण (पहचानकर) मैं ज्ञायक हूँ, मैं अखण्ड ज्ञायक हूँ, उसको विचार करके ग्रहण करना चाहिये। उसके भेदज्ञानका अभ्यास करना चाहिये। मैं चैतन्य अखण्ड हूँ। मैं विभाव- से (भिन्न हूँ)। गुणभेद, पर्यायभेद आदि भेदमें विकल्प आता है। वास्तविक भेद आत्मामें नहीं है। आत्मा अखण्ड है। इसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र सब है। लक्षण भिन्न-भिन्न है, तो भी वस्तु एक है। उसका निर्णय करके उसकी प्रतीत करनी चाहिये। उसमें लीनता करनी चाहिये।
मुमुक्षुः- .. बाहरमें तो अच्छा लगता नहीं है। अन्दर जानेमें कितना समय लगेगा?
समाधानः- क्या कहते हैं? बाहरमें अच्छा नहीं (लगता)। स्वभावकी पहचान करे तो, स्वभावका लक्षण पहचानकर उसकी प्रतीत दृढ होवे, बारंबार अभ्यास करे। जिसको यथार्थ पुरुषार्थ उठता है तो अंतर्मुहूर्तमें हो जाता है। और विशेष पुरुषार्थ करे तो, आचार्यदेव कहते हैं, छः महिनेमें हो जाता है। परन्तु इतना अभ्यास नहीं करता है। अच्छा नहीं लगता है, दुःख लगता है तो भी स्वरूपका लक्षण पीछानकर उसका