Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 35 : Lok Anupreksha, 35 : Lokanu Varnan.

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वचन प्रमाणे दुःख उत्पन्न थवाना समये जे धर्मना परिणाम उत्पन्न थाय छे तेने, दुःख
चाल्युं जवा छतां पण, भूली जता नथी, अने तेथी निज परमात्माना अनुभवना बळथी
निर्जरा माटे द्रष्ट
श्रुतअनुभूत भोगाकांक्षादिरूप विभावपरिणामना परित्यागरूप संवेग
वैराग्य परिणामोमां वर्ते छे.
संवेग अने वैराग्यनुं लक्षण कहे छे. ‘धम्मे य धम्मफलह्नि दंसणे य हरिसो य हुंति
संवेगो संसारदेहभोगेसु विरत्तभावो य वैरग्गं ।। (धर्ममां, धर्मना फळमां अने दर्शनमां जे हर्ष
थाय छे ते संवेग छे; संसार, देह तथा भोगोमां जे विरक्तभाव छे ते वैराग्य छे.)’
ए प्रमाणे निर्जरा - अनुप्रेक्षा पूरी थई. ९.
हवे, लोक - अनुप्रेक्षानुं प्रतिपादन करे छे. ते आ रीतेअनंतानंत आकाशना
बिलकुल मध्यप्रदेशमां घनोदधि, घनवात अने तनुवात नामना त्रण वायुओथी वींटळायेलो,
अनादिनिधन, अकृत्रिम, निश्चळ, असंख्यातप्रदेशी लोक छे. तेनो आकार कहे छेः नीचा
मुखे मूकेलां अर्धा मृदंग उपर आखुं मृदंग मूकवामां आवे छे अने जेवो आकार थाय
तेवो आकार लोकनो छे; परंतु मृदंग गोळाकार होय छे अने लोक चोरस छे, एटलो
तफावत छे. अथवा पग पहोळा करीने, केड उपर हाथ मूकीने ऊभेला पुरुषनो जेवो आकार
होय छे तेवो लोकनो आकार छे. हवे तेनी ज ऊंचाई
लंबाईविस्तारनुं कथन करे छे.
चौद राजु ऊंचो, उत्तरदक्षिण बधे सात राजु पहोळो छे. पूर्वपश्चिममां नीचेना भागमां
दुःखे गतेऽपि न विस्मरति ततश्च निजपरमात्मानुभूतिबलेन निर्जरार्थं दृष्टश्रुतानुभूत-
भोगाकांक्षादिविभावपरिणामपरित्यागरूपैः संवेगवैराग्यपरिणामैर्वर्त्तत इति संवेगवैराग्यलक्षणं
कथ्यते‘‘धम्मे य धम्मफलह्मि दंसणे य हरिसो य हुंति संवेगो संसारदेहभोगेसु
विरत्तभावो य वैरग्गं ’’ इति निर्जरानुप्रेक्षागता ।।।।
अथ लोकानुप्रेक्षां प्रतिपादयति तद्यथाअनंतानंताकाशबहुमध्यप्रदेशे
घनोदधिघनवाततनुवाताभिधानवायुत्रयवेष्टितानादिनिधनाकृत्रिमनिश्चलासंख्यातप्रदेशो लोको-
ऽस्ति
तस्याकारः कथ्यतेअधोमुखार्द्धमुरजस्योपरि पूर्णे मुरजे स्थापिते यादृशाकारो भवति
तादृशाकारः, परं किन्तु मुरजो वृत्तो लोकस्तु चतुष्कोण इति विशेषः अथवा प्रसारितपादस्य
कटितटन्यस्तहस्तस्य चोर्ध्वस्थितपुरुषस्य यादृशाकारो भवति तादृशः इदानीं
तस्यैवोत्सेधायामविस्ताराः कथ्यन्तेचतुर्दशरज्जुप्रमाणोत्सेधस्तथैव दक्षिणोत्तरेण सर्वत्र
सप्तरज्जुप्रमाणायामो भवति पूर्वपश्चिमेन पुनरधोविभागे सप्तरज्जुविस्तारः ततश्चाधोभागात्
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १२९