Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 35 : Adholokanu Varnan.

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सात राजु पहोळो छे, ते अधोभागथी पहोळाई क्रमे क्रमे घटतां ज्यां मध्यलोक छे, त्यां
एक राजु पहोळाई रहे छे. पछी मध्यलोकथी ऊंचे क्रमे क्रमे वधे छे अने ब्रह्मलोकना
अंते पांच राजुनी पहोळाई थाय छे, पछी तेनाथी आगळ फरीथी घटे छे अने लोकना
छेडे ते एक राजुनी पहोळाईवाळो रहे छे. ते ज लोकना मध्यभागमां, खांडणियामां
वच्चोवच नीचे छिद्रवाळी एक वांसनी नळी मूकी होय तेवी, एक चोरस त्रस नाडी छे.
ते एक राजु लांबी
- पहोळी अने चौद राजु ऊंची छे. तेना नीचेना भागमां जे सात राजु
छे ते अधोलोक संबंधी छे. ऊर्ध्वभागमां मध्यलोकनी ऊंचाई संबंधी एक लाख
योजनप्रमाण सुमेरु पर्वतनी ऊंचाई सहित सात राजु ऊर्ध्वलोक संबंधी छे.
हवे पछी, अधोलोकनुं कथन करे छेःअधोभागमां सुमेरु पर्वतने आधारभूत
रत्नप्रभा नामनी पहेली पृथ्वी छे. ते रत्नप्रभा पृथ्वीनी नीचे नीचे एकेक राजुप्रमाण
आकाशमां क्रमपूर्वक शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा अने
महातमप्रभा नामनी छ भूमि छे. तेनी नीचे एक राजुप्रमाण भूमिरहित क्षेत्रमां निगोदादि
पांच स्थावरो भर्या छे. रत्नप्रभा आदि प्रत्येक पृथ्वीने घनोदधि, घनवात अने तनुवात
ए त्रण वायु आधारभूत छे एम जाणवुं. कई पृथ्वीमां केटला नरकनां बिल (उत्पन्न
थवानां स्थान) छे ते क्रमपूर्वक कहे छे. पहेली भूमिमां त्रीस लाख, बीजीमां पचीस लाख,
त्रीजीमां पंदर लाख, चोथीमां दस लाख, पांचमीमां त्रण लाख, छठ्ठीमां नवाणु हजार
क्रमहानिरूपेण हीयते यावन्मध्यलोक एकरज्जुप्रमाणविस्तारो भवति ततो मध्यलोकादूर्ध्वं
क्रमवृद्ध्या वर्द्धते यावद् ब्रह्मलोकान्ते रज्जुपञ्चकविस्तारो भवति ततश्चोर्ध्वं पुनरपि हीयते
यावल्लोकांते रज्जुप्रमाणविस्तारो भवति तस्यैव लोकस्य मध्ये पुनरुदूखलस्य मध्याधोभागे
छिद्रे कृते सति निक्षिप्तवंशनालिकेव चतुष्कोणा त्रसनाडी भवति सा चैकरज्जुविष्कम्भा
चतुर्दशरज्जूत्सेधा विज्ञेया तस्यास्त्वधोभागे सप्तरज्जवोऽधोलोकसंबन्धिन्यः ऊर्ध्वभागे
मध्यलोकोत्सेधसंबन्धिलक्षयोजनप्रमाणमेरूत्सेधः सप्तरज्जव ऊर्ध्वलोकसम्बन्धिन्यः
अतः परमधोलोकः कथ्यते अधोभागे मेरोराधारभूता रत्नप्रभाख्या प्रथम पृथिवी
तस्या अधोऽधः प्रत्येकमेकैकरज्जुप्रमाणामाकाशं गत्वा यथाक्रमेण शर्करावालुकापङ्क-
धूमतमोमहातमः संज्ञा षड् भूमयो भवन्ति
तस्मादधोभागे रज्जुप्रमाणं क्षेत्रं भूमिरहितं
निगोदादिपञ्चस्थावरभृतं च तिष्ठति रत्नप्रभादिपृथिवीनां प्रत्येकं घनोदधिघनवात-
तनुवातत्रयमाधारभूतं भवतीति विज्ञेयम् कस्यां पृथिव्यां कति नरकबिलानि सन्तीति प्रश्ने
यथाक्रमेण कथयतितासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पञ्च
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बृहद्द्रव्यसंग्रह