Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 35 : Manushyalokanu Varnan.

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हवे, तिर्यक्लोकनी वच्चे रहेला मनुष्यलोकनुं व्याख्यान करे छे. ते मनुष्यलोकनी
वच्चे रहेल जंबूद्वीपमां सात क्षेत्रो कहेवामां आवे छे. दक्षिण दिशाथी शरू करीने भरत,
हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक्, हैरण्यवत अने ऐरावत नामनां सात क्षेत्रो छे. क्षेत्रनो शुं
अर्थ छे? क्षेत्र शब्दनो अर्थ वर्ष, वंश, देश अथवा जनपद छे. ते क्षेत्रोना विभाग करनार
छ कुलाचल छे. दक्षिण दिशा तरफथी शरू करीने तेमनां नाम हिमवत्, महा हिमवत्,
निषध, नील, रुकिम अने शिखरि छे. पूर्व
पश्चिम फेलायेला आ छ पर्वतो भरतादि सात
क्षेत्रोनी वचमां छे. पर्वतनो शुं अर्थ छे? पर्वतनो अर्थ वर्षधर पर्वत अथवा सीमा पर्वत
छे. ते पर्वतोनी उपर ह्दोनुं क्रमथी कथन करे छे. पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरि,
महापुंडरीक अने पुंडरीक नामनां अकृत्रिम छ ह्द छे. ह्द एटले शुं? ह्दनो अर्थ सरोवर
छे. ते पद्मादि छ सरोवरोमांथी आगमकथित क्रम प्रमाणे जे चौद महा नदीओ नीकळी
छे, तेमनुं कथन करे छे. ते आ प्रमाणे
हिमवत् पर्वत पर स्थित पद्म नामना महाह्दना
पूर्व तोरण द्वारथी अर्धो कोश ऊंडी, अने छ योजन एक कोश पहोळी गंगा नदी नीकळीने
ते ज पर्वतनी उपर पूर्व दिशामां पांचसो योजन सुधी जाय छे, पछी त्यांथी गंगाकूटनी
पासे दक्षिण तरफ वळीने भूमिमां स्थित कुंडमां पडे छे. त्यांथी दक्षिण द्वारमांथी नीकळीने
भरतक्षेत्रना मध्यभागमां स्थित लंबाईमां पूर्व
पश्चिम समुद्रने स्पर्शनार विजयार्ध पर्वतनी
अथ तिर्यग्लोकमध्यस्थितो मनुष्यलोको व्याख्यायतेतन्मध्यस्थितजम्बूद्वीपे
सप्तक्षेत्राणि भण्यन्ते दक्षिणदिग्विभागादारभ्य भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतसंज्ञानि
सप्तक्षेत्राणि भवन्ति क्षेत्राणि कोऽर्थः ? वर्षा वंशा देशा जनपदा इत्यर्थः तेषां क्षेत्राणां
विभागकारकाः षट् कुलपर्वताः कथ्यन्तेदक्षिणदिग्भागमादीकृत्य हिमवन्महाहिमवन्निषध-
नीलरुक्मिशिखरिसंज्ञा भरतादिसप्तक्षेत्राणामन्तरेषु पूर्वापरायताः षट् कुलपर्वताः भवन्ति
पर्वता इति कोऽर्थः ? वर्षधरपर्वताः सीमापर्वता इत्यर्थः तेषां पर्वतानामुपरि क्रमेण ह्दा
कथ्यन्ते पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीकसंज्ञा अकृत्रिमा षट् ह्दा भवन्ति
ह्दा इति कोऽर्थः ? सरोवराणीत्यर्थः तेभ्यः पद्मादिषड्ह्देभ्यः सकाशादागमकथितक्रमेण
निर्गता याश्चतुर्दशमहानद्यस्ताः कथ्यन्ते तथाहिहिमवत्पर्वतस्थपद्मनाम-
महाह्दादर्धक्रोशावगाहक्रोशाधिकषट्योजन प्रमाणविस्तारपूर्वतोरणद्वारेण निर्गत्य तत्पर्वत-
स्यैवोपारि पूर्वदिग्विभागेन योजनशतपञ्चकम् गच्छति ततो गङ्काकूटसमीपे दक्षिणेन व्यावृत्य
भूमिस्थकुण्डे पतति तस्माद् दक्षिणद्वारेण निर्गत्य भरतक्षेत्रमध्यभागस्थितस्य दीर्घत्वेन
१ ‘क्रोशार्धाधिक षट् योजन’ इति पाठान्तरं
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १३७