छे. ते आ प्रमाणे — सर्वे जीवो केवळज्ञानमय छे एवी भावनाथी जे समतारूप परिणाम
ते सामायिक छे अथवा परम स्वास्थ्यना बळथी युगपत् समस्त शुभाशुभ संकल्प
– विकल्पोना त्यागरूप समाधि जेनुं लक्षण छे ते सामायिक छे अथवा निर्विकार स्वसंवेदनना
बळथी राग – द्वेषना परिहाररूप सामायिक छे अथवा निज शुद्धात्माना अनुभवना बळथी
आर्त अने रौद्रध्यानना परित्यागरूप सामायिक छे अथवा समस्त सुख – दुःखादिमां
मध्यस्थभावरूप सामायिक छे.
हवे, छेदोपस्थापननुं कथन करे छेः ज्यारे एक साथे समस्त विकल्पोना त्यागरूप
परम सामायिकमां स्थित थवाने आ जीव अशक्त होय छे, त्यारे ‘समस्त हिंसा, असत्य,
चोरी, अब्रह्म अने परिग्रहथी विरति ते व्रत छे’ — ए प्रमाणे आ पांच प्रकारना विकल्प-
भेद वडे – व्रतरूप छेद वडे रागादि विकल्परूप सावद्योथी पोताने पाछो वाळीने
निजशुद्धात्मामां पोताने स्थापे छे, ते छेदोपस्थापन छे अथवा छेद अर्थात् व्रतनो भंग
थतां निर्विकार स्वसंवेदनरूप निश्चय – प्रायश्चित्तथी अथवा तेना साधक बहिरंग
व्यवहारप्रायश्चित्तथी पोताना आत्मामां स्थित थवुं, ते छेदोपस्थापन छे. हवे,
परिहारविशुद्धिनुं कथन करे छेः ‘‘तीसं वासो जम्मे वासपुहत्तं खु तित्थयरमूले । पच्चक्खाणं पढिदो
संज्झूण दुगाउ य विहारो ।।१ (अर्थः — जे जन्मथी त्रीस वर्ष सुधी सुखमां व्यतीत करीने,
वर्ष पृथक्त्व (आठ वर्ष) सुधी तीर्थंकरनां चरणोमां प्रत्याख्यान नामनुं नवमुं पूर्व भणीने,
त्रणे संध्याकाळ सिवायना समये दररोज बे कोश गमन करे छे)’’ — आ गाथामां कहेला
इति भावनारूपेण समतालक्षणं सामायिकम्, अथवा परमस्वास्थ्यबलेन युगपत्समस्त-
शुभाशुभसंकल्पविकल्पत्यागरूपसमाधिलक्षणं वा, निर्विकारस्वसंवित्तिबलेन रागद्वेषपरिहाररूपं
वा, स्वशुद्धात्मानुभूतिबलेनार्त्तरौद्रपरित्यागरूपं वा, समस्तसुखदुःखादिमध्यस्थरूपं चेति । अथ
छेदोपस्थापनं कथयति — यदा युगपत्समस्तविकल्पत्यागरूपे परमसामायिके स्थातुमशक्तोऽयं
जीवस्तदा समस्तहिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतमित्यनेन पञ्चप्रकारविकल्पभेदेन
व्रतच्छेदेन रागादिविकल्परूपसावद्येभ्यो निवर्त्य निजशुद्धात्मन्यात्मानमुपस्थापयतीति
छेदोपस्थापनम् । अथवा छेदे व्रतखण्डे सति निर्विकारस्वसंवित्तिरूपनिश्चयप्रायश्चित्तेन
तत्साधकबहिरंगव्यवहारप्रायश्चित्तेन वा स्वात्मन्युपस्थापनं छेदोपस्थापनमिति । अथ
परिहारविशुद्धिं कथयति — ‘‘तीसं वासो जम्मे वासपुहत्तं खु तित्थयरमूले । पच्चक्खाणं पढिदो
संज्झूण दुगाउ य विहारो ।१।’’ इति गाथाकथितक्रमेण मिथ्यात्वरागादिविकल्पमलानां
१. श्री गोम्मटसार जीवकांड गाथा ४७३.
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