Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 37 : Moksha Tattvanu Kathan.

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आ प्रमाणे निर्जरातत्त्वना व्याख्यानमां एक सूत्रथी चोथुं स्थळ पूरुं थयुं. ३६.
हवे, मोक्षतत्त्वनुं कथन करे छेः
गाथा ३७
गाथार्थःजे सर्व कर्मोना नाशनुं कारण छे एवा आत्माना परिणाम तेने
भावमोक्ष जाणवो; कर्मोनुं आत्माथी सर्वथा पृथक् थवुं ते द्रव्यमोक्ष छे.
टीकाःजोके सामान्यपणे संपूर्ण कर्ममळ - कलंकरहित, शरीररहित आत्मानुं
आत्यंतिक, स्वाभाविक, अचिंत्य, अद्भुत, अनुपम, संपूर्ण - निर्मळ केवळज्ञानादि अनंत
गुणोनां स्थानरूप जे अवस्थान्तर (आवी जे विशिष्ट अवस्था) ते ज मोक्ष कहेवाय छे,
तोपण विशेषपणे भाव अने द्रव्यना भेदथी ते (मोक्ष) बे प्रकारनो छेएम वार्त्तिक छे.
ते आ रीते छे‘णेयो स भावमुक्खो’ तेने भावमोक्ष जाणवो. ते कोण? ‘‘अप्पणो हु
परिणामो’’ निश्चयरत्नत्रयात्मक कारण समयसाररूप ‘हु’ प्रगट आत्माना परिणाम. केवा
निर्जराव्याख्याने सूत्रेणैकेन चतुर्थस्थलं गतम्
अथ मोक्षतत्त्वमावेदयति :
सव्वस्स कम्मणो जो खयहेदू अप्पणो हु परिणामो
णेयो स भावमुक्खो दव्वविमुक्खो य कम्मपुहभावो ।।३७।।
सर्वस्य कर्मणः यः क्षयहेतुः आत्मनः हि परिणामः
ज्ञेयः सः भावमोक्षः द्रव्यविमोक्षः च कर्म्मपृथग्भावः ।।३७।।
व्याख्यायद्यपि सामान्येन निरवशेषनिराकृतकर्ममलकलंकस्याशरीरस्यात्मन
आत्यन्तिकस्वाभाविकाचिन्त्याद्भुतानुपमसकलविमलकेवलज्ञानाद्यनन्तगुणास्पदमवस्थान्तरं मोक्षो
भण्यते तथापि विशेषेण भावद्रव्यरूपेण द्विधा भवतीति वार्तिकम्
तद्यथा‘‘णेयो स
भावमुक्खो’’ णेयो ज्ञातव्यः स भावमोक्षः स कः ? ‘‘अप्पणो हु परिणामो’’
निश्चयरत्नत्रयात्मककारणसमयसाररूपो ‘‘हु’’ स्फु टमात्मनः परिणामः कथंभूतः ?
सर्व कर्मका क्षयकर भाव, चेतनकै ह्वै मोक्षसुभाव;
कर्मजीव न्यारे जो होय, द्रव्य - विमोक्ष कहावै सोय. ३७.
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १७१