Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Abhedpane Aatma Ja Mokshamarga Chhe.

< Previous Page   Next Page >


Page 181 of 272
PDF/HTML Page 193 of 284

 

background image
अथवा स्वशुद्धात्मभावनासाधकबहिर्द्रव्याश्रितो व्यवहारमोक्षमार्गः केवलस्वसंवित्तिसमुत्पन्न-
रागादिविकल्पोपाधिरहितसुखानुभूतिरूपोनिश्चयमोक्षमार्गः अथवा धातुपाषाणेऽग्निवत्साधको
व्यवहारमोक्षमार्गः, सुवर्णस्थानीयनिर्विकारस्वोपलब्धिसाध्यरूपो निश्चयमोक्षमार्गः एवं संक्षेपेण
व्यवहारनिश्चयमोक्षमार्गलक्षणं ज्ञातव्यमिति ।।३९।।
अथाभेदेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि स्वशुद्धात्मैव तेन कारणेन
निश्चयेनात्मैव निश्चयमोक्षमार्ग इत्याख्याति अथवा पूर्वोक्तमेव निश्चयमोक्षमार्गं प्रकारान्तरेण
दृढयति :
रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाणं मुइत्तु अण्णदवियह्मि
तह्मा तत्तियमइउ होदि हु मुक्खस्स कारणं आदा ।।४०।।
अथवा स्वशुद्धात्मभावनानो साधक, बाह्यपदार्थाश्रित व्यवहारमोक्षमार्ग छे; मात्र
स्वसंवेदनथी उत्पन्न, रागादि विकल्पनी उपाधिथी रहितएवा सुखनी अनुभूतिरूप
निश्चयमोक्षमार्ग छे. अथवा धातुपाषाणनी बाबतमां अग्निसमान साधक ते
व्यवहारमोक्षमार्ग छे अने सुवर्णसमान निर्विकार निजात्मानी उपलब्धिरूप साध्य ते
निश्चयमोक्षमार्ग छे. आ प्रमाणे संक्षेपथी व्यवहार अने निश्चय मोक्षमार्गनुं लक्षण
जाणवुं. ३९.
हवे, अभेदपणे सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र ते शुद्धात्मा ज छे, ते कारणे निश्चयथी
आत्मा ज निश्चयमोक्षमार्ग छे, एम कहे छे. अथवा पूर्वोक्त निश्चयमोक्षमार्ग बीजा प्रकारे
द्रढ करे छेः
१. जेमने ते अनुष्ठान छे तेने मात्र उपचारथी ज स्वशुद्धात्मानी भावनानो साधक कहेवामां आव्यो छे,
एम समजवुं. ( पंचास्तिकाय संग्रह गुजराती, पृष्ठ २५९ फूटनोट.)
२. जुओ, श्री पंचास्तिकाय गाथा १६० टीका पा. २३५२३६ बन्ने आचार्योनी टीका. अग्नि तो
निमित्तमात्र छे तेम व्यवहार निमित्तमात्र छे. आ क्रियाकांड परिणति छे ते तो राग छे. धर्मी जीवने
तेनुं माहात्म्य केम होई शके? जुओ, श्री पंचास्तिकाय गाथा १७२ टीका पा. २६२.
दर्शन बोध चारित्र जु तीन, आतमविन परमैं न प्रवीन;
तातैं तीनांमयी सु आप, कारन मोक्ष कह्यौ विन पाप. ४०.
मोक्षमार्ग अधिकार [ १८१