Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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व्याख्या :‘‘जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं’’ वीतरागसर्वज्ञप्रणीतशुद्धजीवादितत्त्वविषये
चलमलिनागाढरहितत्वेन श्रद्धानं रुचिर्निश्चय इदमेवेत्थमेवेति निश्चयबुद्धिः सम्यग्दर्शनम्
‘‘रूवमप्पणो तं तु’’ तच्चाभेदनयेन रूपं स्वरूपं तु; पुनः कस्य ? आत्मन आत्मपरिणाम
इत्यर्थः
तस्य सामर्थ्यं माहात्म्यं दर्शयति ‘‘दुरभिणिवेसविमुक्कं णाणं सम्मं खु होदि सदि
जह्मि’’ यस्मिन् सम्यक्त्वे सति ज्ञानं सम्यग् भवति स्फु टं कथम्भूतं सम्यग्भवति ?
‘‘दुरभिणिवेसविमुक्कं’’ चलितप्रतिपत्तिगच्छत्तृणस्पर्शशुक्तिकाशकलरजतविज्ञानसदृशैः संशय-
विभ्रमविमोहैर्मुक्तं रहितमित्यर्थः
टीकाः‘‘जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं’’ वीतरागसर्वज्ञप्रणीत शुद्ध जीवादि तत्त्वोमां
चळ, मळ, अगाढ (दोष) रहित श्रद्धारुचिनिश्चय अने ‘आ ज छे, आवी रीते ज छे,’
एवी निश्चयबुद्धि ते सम्यग्दर्शन छे. ‘‘रूवमप्पणो तं तु’’ अने ते सम्यग्दर्शन अभेदनयथी
स्वरूप छे. कोनुं स्वरूप छे? आत्मानुं; ते आत्माना परिणाम छे, एम अर्थ छे.
तेनुं (सम्यग्दर्शननुं) सामर्थ्य अने माहात्म्य देखाडे छे; ‘‘दुरभिणिवेसविमुक्कं णाणं सम्मं
खु होदि सदि जह्मि’’ जे सम्यक्त्व थतां ज्ञान प्रगटपणे सम्यक् थई जाय छे. केवुं सम्यक्
थाय छे? ‘‘दुरभिणिवेसविमुक्कं’’ चलायमान संशयज्ञान (अर्थात् आम हशे के आम एवा)
संशयथी, गमन करतां तृणस्पर्श थतां ‘शेनो स्पर्श थयो’ तेना अनिश्चयरूप विभ्रमथी अने
‘छीपना टुकडामां, चांदीनुं ज्ञान थाय’ एवा विमोहथी
ए त्रणे दोषोथी रहित सम्यक्ज्ञान
थई जाय छे.
१. ते आत्माना परिणाम होवाथी शुद्ध परिणाम छे. सम्यग्दर्शन प्रगट थती वखते ‘‘निष्क्रिय चिन्मात्रभावने
पामे छे.’’ एम श्री प्रवचनसार गाथा ८० पा-१३८ मां कह्युं छे ते ज निर्विकल्प दशा छे. श्री
जयसेनाचार्य कहे छे के ‘‘आगमनी भाषाथी अधःकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण नामना
परिणामविशेषोना बळथी जे विशेषभाव दर्शनमोहनो अभाव करवाने समर्थ छे, तेमां पोताना आत्माने
जोडे छे. त्यारपछी निर्विकल्प स्वरूपनी प्राप्ति माटे
जेम पर्यायरूपे मोतीना दाणा, गुणरूपे सफेदी
आदि अभेदनयथी एक हाररूप ज मालूम पडे छे तेमपूर्वे कहेलां द्रव्यगुणपर्याय अभेदनयथी
आत्मा ज छे, एवी भावना करतां करतां दर्शनमोहनो अंधकार नष्ट थई जाय छे.’’ (श्री प्रवचनसार
श्री जयसेनाचार्य टीका पा. १३८)
वळी, श्री प्रवचनसार गाथा १९४नी टीकामां पण नीचेना शब्दोमां ते ज सिद्धांतनुं प्रतिपादन कर्युं
छे. (पा. ३५८-३५९)
टीकाः‘‘यथोक्त विधि वडे शुद्धात्माने जे ध्रुव जाणे छे तेने तेमां ज प्रवृत्ति द्वारा शुद्धात्मतत्त्व
होय छे, तेथी अनंत शक्तिवाळा चिन्मात्र परमआत्मानुं एकाग्र संचेतनध्यान होय छे अने तेथी
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