Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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निरञ्जननिर्दोषपरमात्मैव देव इति निश्चयबुद्धिर्देवतामूढरहितत्वं विज्ञेयम् तथैव च
मिथ्यात्वरागादिमूढभावत्यागेन स्वशुद्धात्मन्येवावस्थानं लोकमूढरहितत्वं विज्ञेयम् तथैव च
समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परूपपरभावत्यागेन निर्विकारतात्त्विकपरमानन्दैकलक्षणपरमसमरसी-
भावेन तस्मिन्नेव सम्यग्रूपेणायनं गमनं परिणमनं समयमूढरहितत्वं बोद्धव्यम्
इति मूढत्रयं
व्याख्यातम्
अथ मदाष्टस्वरूपं कथ्यते विज्ञानैश्वर्यज्ञानतपःकुलबलजातिरूपसंज्ञं मदाष्टकं
सरागसम्यग्दृष्टिभिस्त्याज्यमिति वीतरागसम्यग्दृष्टीनां पुनर्मानकषायादुत्पन्नमदमात्सर्यादिसमस्त-
विकल्पजालपरिहारेण ममकाराहंकाररहिते स्वशुद्धात्मनि भावनैव मदाष्टकत्याग इति
ममकाराहङ्कारलक्षणं कथयति कर्मजनितदेहपुत्रकलत्रादौ ममेदमिति ममकारस्तत्रैवाभेदेन
मनवचनकायानी गुप्तिरूप अवस्था जेनुं लक्षण छे एवा वीतराग सम्यक्त्वना
प्रसंगे तो‘पोताना निरंजन, निर्दोष परमात्मा ज देव छे’ एवी निश्चयबुद्धि ज
देवमूढताथी रहितपणुं छे एम जाणवुं; तथा मिथ्यात्वरागादि मूढभावोनो त्याग करीने
जे पोताना शुद्ध आत्मामां ज स्थिति छे ते लोकमूढताथी रहितपणुं छे एम जाणवुं; तेवी
ज रीते समस्त शुभाशुभ संकल्प-विकल्परूप परभावनो त्याग करीने, निर्विकार तात्त्विक
परमानंद जेनुं एक लक्षण छे एवा परम समरसीभावथी तेमां ज (शुद्धात्मामां ज) सम्यक्
प्रकारे अयन
गमनपरिणमन छे ते समयमूढताथी रहितपणुं छे, एम जाणवुं. ए प्रमाणे
त्रण मूढतानुं व्याख्यान कर्युं.
हवे, आठ मदोनुं स्वरूप कहे छेःविज्ञान, ऐश्वर्य, ज्ञान, तप, कुळ, बळ, जाति
अने रूपए आठे मदोनो त्याग सराग सम्यग्द्रष्टिओए करवो जोईए. वीतराग
सम्यक्द्रष्टिओने तो मानकषायथी उत्पन्न थता मद, मात्सर्य (इर्ष्या ) आदि समस्त
विकल्पजाळना त्याग वडे, ममकारअहंकार रहित निज शुद्धात्मामां भावना ते ज आठ
मदोनो त्याग छे. ममकार अने अहंकारनुं लक्षण कहे छेःकर्मजनित देह, पुत्र, स्त्री
२. जे जीवोने यथार्थ सम्यग्दर्शन तो चतुर्थ गुणस्थाने प्रगट्युं छे अने चारित्र अपेक्षाए जेने वीतरागता
प्रगटी छे तेने वीतराग सम्यक्त्वी कहेवाय छे. बीजा साचा सम्यग्द्रष्टिने साथे चारित्रदशामां चोथे,
पांचमे अने छठ्ठे गुणस्थाने जे राग रह्यो छे, तेनुं ज्ञान कराववा तेने सराग सम्यग्द्रष्टि कहे छे. छठ्ठा
गुणस्थानधारी मुनिने निर्जरा अपेक्षाए वीतरागसम्यग्द्रष्टि कह्या छे. (जुओ, श्री समयसार, श्री
जयसेनाचार्य टीका गा. २०१
२).......तथा आस्रव अपेक्षाए तेने ज सरागसम्यग्द्रष्टि कह्या छे. माटे
सर्वत्र जे अपेक्षाए कथन कर्युं होय ते अपेक्षा यथार्थपणे समजवी. (जुओ, श्री समयसार गा. १७७
१७८ नी श्री जयसेनाचार्य टीका.)
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