Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सन्देहो न कर्त्तव्य तत्र शंकादिदोषपरिहारविषये पुनरञ्जनचौरकथा प्रसिद्धा तत्रैव
विभीषणकथा तथाहिसीताहरणप्रघट्टके रावणस्य रामलक्ष्मणाभ्यां सह संग्रामप्रस्तावे
विभीषणेन विचारितं रामस्तावदष्टमबलदेवो लक्ष्मणश्चाष्टमो वासुदेवो रावणश्चाष्टमः प्रतिवासुदेव
इति
तस्य च प्रतिवासुदेवस्य वासुदेवहस्तेन मरणमिति जैनागमे कथितमास्ते, तन्मिथ्या न
भवतीति निःशंको भूत्वा, त्रैलोक्यकण्टकं रावणं स्वकीयज्येष्ठभ्रातरं त्यक्त्वा,
त्रिंशदक्षौहिणीप्रमितचतुरंगबलेन सह स रामस्वामिपार्श्वे गत इति
तथैव देवकीवसुदेवद्वयं
निःशङ्कं ज्ञातव्यम् तथाहियदा देवकीबालकस्य मारणनिमित्तं कंसेन प्रार्थना कृता तदा
ताभ्यां पर्यालोचितं मदीयः पुत्रो नवमो वासुदेवो भविष्यति तस्य हस्तेन जरासिन्धुनाम्नो
नवमप्रतिवासुदेवस्य कंसस्यापि मरणं भविष्यतीति जैनागमे भणितं तिष्ठतीति,
नथी. त्यां शंका आदि दोषना त्यागनी बाबतमां अंजनचोरनी कथा प्रसिद्ध छे. ते
बाबतमां ज विभीषणनी कथा पण (प्रसिद्ध) छे. ते आ रीतेसीताहरण
प्रकरणमां रावणने रामलक्ष्मण साथे युद्ध करवानो प्रसंग आव्यो, त्यारे विभीषणे
विचार कर्यो के राम तो आठमा बळदेव छे अने लक्ष्मण आठमा वासुदेव छे, तथा
रावण आठमा प्रतिवासुदेव छे. ते प्रतिवासुदेवनुं मरण वासुदेवना हाथे थाय छे, एम
जैन आगममां कह्युं छे, ते मिथ्या थई शकतुं नथी;
एम निःशंक थईने पोताना
मोटाभाई, त्रण लोकना कंटकरूप रावणने छोडीने, (पोतानी) त्रीस अक्षौहिणी चतुरंग
सेना सहित ते रामचंद्रनी पासे चाल्यो गयो. तेवी ज रीते देवकी अने वसुदेव
ए बन्नेने पण निःशंक जाणवां. ते आ प्रमाणेज्यारे देवकीना पुत्रने मारवाने
माटे कंसे प्रार्थना करी, त्यारे ते बन्नेए (देवकी अने वसुदेवे) विचार्युं के मारो पुत्र
नवमो वासुदेव थशे अने तेना हाथे जरासिन्धु नामना नवमा प्रतिवासुदेवनुं अने
कंसनुं पण मरण थशे, एम जैन आगममां कह्युं छे तेम ज अतिमुक्त भट्टारके
१. आ कथा संबंधमां मोक्षमार्गप्रकाशकमां नीचे प्रमाणे कह्युं छे. पा. २७६. ‘‘वळी प्रथमानुयोगमां
उपचाररूप कोई धर्मअंग थतां त्यां संपूर्ण धर्म थयो कहीए छीए. जेम जीवोने शंकाकांक्षादि न करतां
तेने सम्यक्त्व थयुं कहीए छीए; पण कोई कार्यमां शंकाकांक्षादि न करवा मात्रथी सम्यक्त्व तो न
थाय. सम्यक्त्व तो तत्त्वश्रद्धा थतां ज थाय छे; परंतु अहीं निश्चयसम्यक्त्वनो तो व्यवहारसम्यक्त्वमां
उपचार कर्यो तथा व्यवहारसम्यक्त्वना कोई अंगमां संपूर्ण व्यवहारसम्यक्त्वनो उपचार कर्यो; ए प्रमाणे
तेने उपचारथी सम्यक्त्व थयुं कहीए छीए.’’
नोटःउपचारथी सम्यग्ज्ञान तथा उपचारथी सम्यक् चारित्रनुं स्वरूप पण त्यां कह्युं छे, ते त्यांथी
समजी लेवुं.
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बृहद्द्रव्यसंग्रह