Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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विद्याधरब्रह्मचारिसम्बन्धिनीकथा प्रसिद्धेति निश्चयेन पुनस्तस्यैव व्यवहारामूढदृष्टिगुणस्य
प्रसादेनान्तस्ततत्त्वबहिस्तत्त्वनिश्चये जाते सति समस्तमिथ्यात्वरागादिशुभाशुभसंकल्प-
विकल्पेष्टात्मबुद्धिमुपादेयबुद्धिं हितबुद्धिं ममत्वभावं त्यक्त्वा त्रिगुप्तिरूपेण विशुद्धज्ञानदर्शन-
स्वभावे निजात्मनि यन्निश्चलावस्थानं तदेवामूढदृष्टित्वमिति
संकल्पविकल्पलक्षणं कथ्यते
पुत्रकलत्रादौ बहिर्द्रव्ये ममेदमिति कल्पना संकल्पः, अभ्यन्तरे सुख्यहं दुःख्यहमिति
हर्षविषादकारणं विकल्प इति
अथवा वस्तुवृत्त्या संकल्प इति कोऽर्थो विकल्प इति तस्यैव
पर्यायः ।।।।
अथोपगूहनगुणं कथयति भेदाभेदरत्नत्रयभावनारूपो मोक्षमार्गः स्वभावेन शुद्ध एव
तावत्, तत्राज्ञानिजननिमित्तेन तथैवाशक्तजननिमित्तेन च धर्मस्य पैशुन्यं दूषणमपवादो
दुष्प्रभावना यदा भवति तदागमाविरोधेन यथाशक्त्यऽर्थेन धर्मोपदेशेन वा यद्धर्मार्थं दोषस्य
झम्पनं निवारणं क्रियते तद्व्यवहारनयेनोपगूहनं भण्यते
तत्र मायाब्रह्मचारिणा
श्राविका तथा चन्द्रप्रभ नामना विद्याधर ब्रह्मचारीनी कथाओ प्रसिद्ध छे. निश्चयथी तो ते
ज व्यवहार
अमूढद्रष्टिगुणना प्रसादथी अंतःतत्त्व अने बहिःतत्त्वनो निश्चय थतां समस्त
मिथ्यात्वरागादि शुभाशुभ संकल्पविकल्पोमां इष्टबुद्धिआत्मबुद्धिउपादेयबुद्धि
हितबुद्धिममत्वभावनो त्याग करीने त्रिगुप्तिरूपे विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावी निजात्मामां जे
निश्चळ स्थिति करवी, ते ज अमूढद्रष्टिपणुं छे. संकल्प अने विकल्पनुं लक्षण कहे छेः
पुत्र, स्त्री आदि बाह्यद्रव्योमां ‘आ मारां छे’ एवी कल्पना ते संकल्प छे, अंतरंगमां ‘हुं
सुखी छुं, हुं दुःखी छुं’ एम हर्ष
विषाद करवो ते विकल्प छे, अथवा वास्तविकपणे
संकल्पनो अर्थ शुं? विकल्प ए ज. (संकल्प ए ज विकल्प) ते तेनी ज पर्याय छे. (संकल्प,
विकल्पनी ज पर्याय छे). ४.
हवे उपगूहनगुण कहे छेःभेदाभेद रत्नत्रयनी भावनारूप मोक्षमार्ग
स्वभावथी शुद्ध ज छे. तेमां अज्ञानी मनुष्योना निमित्ते तथा अशक्त मनुष्योना निमित्ते
धर्मनी निन्दा
दोषअपवाद के अप्रभावना ज्यारे थाय छे, त्यारे आगमना अविरोधपणे
शक्ति अनुसार धनथी के धर्मोपदेशथी धर्मने माटे जे दोषोने ढांकवामां आवे छे अथवा
दूर करवामां आवे छे, ते व्यवहारनयथी उपगूहनगुण कहेवाय छे. ते विषयमां मायाचारथी
१. व्यवहारना प्रसादथी अर्थात् ज्यारे पोतानी सन्मुखतारूप निश्चय प्रसाद होय, त्यारे निमित्तने
व्यवहारनये प्रसाद कहेवामां आवे छे.
२. भेद रत्नत्रय व्यवहारनये शुद्ध छे अने अभेद रत्नत्रय निश्चयनये शुद्ध छे, बन्ने साथे होय छे.
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