Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सम्यक्त्वत्रयमध्ये कस्यां गतौ कस्य सम्यक्त्वस्य सम्भवोऽस्तीति कथयति
‘‘सौधर्मादिष्वसंख्याब्दायुष्कतिर्यक्षु नृष्वपि रत्नप्रभावनौ च स्यात्सम्यक्त्वत्रयमङ्गिनाम् ’’
कर्मभूमिजपुरुषे च त्रयं सम्भवति बद्धायुष्के लब्धायुष्केऽपि किन्त्वौपशमिकपर्याप्तावस्थायां
महर्द्धिकदेवेष्वेव ‘‘शेषेषु देवतिर्यक्षु षट्स्वधः श्वभ्रभूमिषु द्वौ वेदकोपशमकौ स्यातां
पर्याप्तदेहिनाम् ’’ इति निश्चयव्यवहाररत्नत्रयात्मकमोक्षमार्गावयविनः प्रथमावयवभूतस्य
सम्यक्त्वस्य व्याख्यानेन गाथा गता ।।४१।।
अथ रत्नत्रयात्मकमोक्षमार्गद्वितीयावयवरूपस्य सम्यग्ज्ञानस्य स्वरूपं प्रतिपादयति
ज्योतिषी, भवनवासी अने व्यन्तरदेवोमां, नीचेनी छ नरकनी पृथ्वीओमां, तिर्यंचोमां,
मनुष्य स्त्रीओमां अने देवांगनाओमां सम्यग्द्रष्टि उत्पन्न थता
नथी.]’’
औपशमिक, वेदक अने क्षायिक नामना त्रण सम्यक्त्वोमांथी कई गतिमां क्युं
सम्यक्त्व संभवे छे, तेनुं कथन करे छेः‘‘सौधर्म आदि स्वर्गोमां, असंख्य वर्षना
आयुष्यवाळा तिर्यंचोमां, मनुष्योमां अने रत्नप्रभा प्रथम नरकमां त्रणे सम्यक्त्व होय छे.
२.’’ जेमणे आयुष्य बांध्युं होय के न बांध्युं होय तेवा कर्मभूमिना मनुष्योमां त्रणे
सम्यक्त्व होय छे, परंतु अपर्याप्त अवस्थामां औपशमिक सम्यक्त्व महर्द्धिक देवोमां ज
होय छे.
‘‘शेषेषु देवतिर्यक्षु षट्स्वधः श्वभ्रभूमिषु द्वौ वेदकोपशमकौ स्यातां पर्याप्तदेहिनाम्
[अर्थःबाकीना देवो अने तिर्यंचोमां अने नीचेनी छ नरक भूमिओमां पर्याप्त जीवोने
वेदक अने उपशम ए बे ज सम्यक्त्व होय छे.]’’
आ रीते निश्चयव्यवहार रत्नत्रयात्मक मोक्षमार्गे जे अवयवी तेना प्रथम
अवयवरूप सम्यक्त्वनुं व्याख्यान करनारी गाथा पूरी थई. ४१.
हवे, रत्नत्रयात्मक मोक्षमार्गना बीजा अवयवरूप सम्यग्ज्ञाननुं स्वरूप
१. नृभोगभूमितिर्यक्षु सौधर्मादिषु नाकिषु आद्ययां श्वभ्रभूमौ च सम्यक्त्वत्रयमिष्यते ।।३००।।
२. शेष त्रिदशतिर्यक्षु षट्स्वधः श्वभ्रभूमिषु पर्याप्तेषु द्वयं ज्ञेयं क्षायिकेण विनांगिषु ।।३०१।।
(अमितगति) पंचसंग्रह प्रथम परिच्छेद
३. श्री सुभाषित रत्नसंदोह गाथा ८२९.
४. निश्चयव्यवहार रत्नत्रय एक साथे ज होय छे. व्यवहारनो हर समय अंशे अभाव थई निश्चय
रत्नत्रय वृद्धिंगत थाय छे.
२०० ]
बृहद्द्रव्यसंग्रह