Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Samyakgyananu Swaroop.

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संसयविमोहविब्भमविवज्जियं अप्पपरसरूवस्स
गहणं सम्मण्णाणं सायारमणेयभेयं तु ।।४२।।
संशयविमोहविभ्रमविवर्जित आत्मपरस्वरूपस्य
ग्रहणं सम्यक् ज्ञानं साकारं अनेकभेदं च ।।४२।।
व्याख्या :‘‘संसयविमोहविब्भमविवज्जियं’’ ‘‘संशयः’’ शुद्धात्मतत्त्वादिप्रतिपादक-
मागमज्ञानं किं वीतरागसर्वज्ञप्रणीतं भविष्यति परसमयप्रणीतं वेति, संशयः तत्र दृष्टान्तः
स्थाणुर्वा पुरुषो वेति ‘‘विमोहः’ परस्परसापेक्षनयद्वयेन द्रव्यगुणपर्यायादिपरिज्ञानाभावो
विमोहः तत्र दृष्टान्तःगच्छत्तृणस्पर्शवद्दिग्मोहवद्वा ‘‘विभ्रमः’’ अनेकान्तात्मकवस्तुनो
नित्यक्षणिकैकान्तादिरूपेण ग्रहणं विभ्रमः तत्र दृष्टान्त :शुक्तिकायां रजतविज्ञानवत्
प्रतिपादन करे छेः
गाथा ४२
गाथार्थःआत्मा अने परपदार्थोना स्वरूपने संशय, विमोह अने विभ्रमरहित
जाणवुं ते सम्यक्ज्ञान छे; ते साकार अने अनेक भेदोवाळुं छे.
टीकाः‘‘संसयविमोहविब्भमविवज्जियं’’ संशयशुद्ध आत्मतत्त्वादिनुं प्रतिपादक
शास्त्रज्ञान शुं वीतराग सर्वज्ञे कहेलुं ते सत्य हशे के अन्यमतीओए कहेलुं सत्य हशे, ए
संशय छे. तेनुं द्रष्टांत
झाडनुं ठूंठुं छे के माणस छे? विमोहपरस्पर सापेक्ष द्रव्यार्थिक
अने पर्यायार्थिक ए बन्ने नयो प्रमाणे द्रव्यगुणपर्यायादिना ज्ञाननो अभाव ते विमोह
छे. त्यां द्रष्टांतगमन करनार पुरुषने पगमां तृण आदिनो स्पर्श थतां स्पष्ट ज्ञान न
थाय के शेनो स्पर्श थयो ते अथवा दिशा भूलाई जवी ते. विभ्रमअनेकान्तात्मक वस्तुने
‘आ नित्य ज छे,’ ‘आ क्षणिक ज छे’ एम एकान्तरूप जाणवुं, ते विभ्रम छे. तेनुं
१. द्रव्यार्थिकनय अने पर्यायार्थिकनय एकबीजानी अपेक्षा सहित होय छे, निरपेक्ष होता नथी. जेमके, द्रव्यनुं
ज्ञान मुख्य होय त्यारे पर्यायनुं ज्ञान गौण होय छे, सर्वथा अभावरूप होतुं नथीपर्यायनो सर्वथा
अस्वीकार होतो नथी.
संसय विमोह विभ्रम दूरि, आपा परकूं गहै जरूरि;
सो है सम्यक्ज्ञान, अनेक, भेद लीयें साकार अटेक. ४२.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २०१