Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Vikalp Rahit Sattanu Grahan Karnar Darshananu Kathan.

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होवाथी सविकल्प छे, तोपण बाकीना अनिच्छित सूक्ष्मविकल्पोनो सद्भाव होवा छतां तेमनुं
मुख्यपणुं नथी ते कारणे निर्विकल्प पण कहेवाय छे; तेवी ज रीते स्वशुद्धात्माना संवेदनरूप
वीतरागस्वसंवेदनज्ञान पण स्वसंवेदनना एक आकाररूप विकल्पमय होवाथी सविकल्प छे,
तोपण बाह्य
विषयोना अनिच्छित सूक्ष्म विकल्पोनो सद्भाव होवा छतां तेमनुं मुख्यपणुं
न होवाथी निर्विकल्प पण कहेवाय छे. अहीं अपूर्व स्वसंवेदनना आकाररूप अंतर्मुख
प्रतिभास होवा छतां बाह्य विषयोना अनिच्छित सूक्ष्म विकल्पो पण छे ज, ते ज कारणे
ज्ञान स्वपरप्रकाशक पण सिद्ध थाय
छे. जो आ सविकल्प - निर्विकल्प अने स्वपरप्रकाशक
ज्ञाननुं व्याख्यान आगम, अध्यात्म अने तर्कशास्त्रने अनुसरीने विशेषरूपे करवामां आवे
तो घणो विस्तार थई जाय. पण (द्रव्यसंग्रह) अध्यात्मशास्त्र होवाथी ते विस्तार कर्यो नथी.
आ रीते रत्नत्रयात्मक मोक्षमार्ग जे अवयवी तेना बीजा अवयवरूप ज्ञानना
व्याख्यान द्वारा गाथा समाप्त थई. ४२.
हवे, विकल्परहित सत्तानुं ग्रहण करनार दर्शननुं कथन करे छेः
निर्विकल्पमपि भण्यते यत एवेहापूर्वस्वसंवित्त्याकारान्तर्मुखप्रतिभासेऽपि बहिर्विषयानीहित-
सूक्ष्माविकल्पा अपि सन्ति तत एव कारणात् स्वपरप्रकाशकं च सिद्धम् इदं तु
सविकल्पकनिर्विकल्पकस्य तथैव स्वपरप्रकाशकस्य ज्ञानस्य च व्याख्यानं यद्यागमाध्यात्मतर्क-
शास्त्रानुसारेण विशेषेण व्याख्यायते तदा महान् विस्तारो भवति
च चाध्यात्मशास्त्रत्वान्न कृत
इति
एवं रत्नत्रयात्मकमोक्षमार्गावयविनो द्वितीयावयवभूतस्य ज्ञानस्य व्याख्यानेन गाथा
गता ।।४२।।
अथ निर्विकल्पसत्ताग्राहकं दर्शनं कथयति :
जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टुमायारं
अविसेसिदूण अट्ठे दंसणमिदि भण्णए समए ।।४३।।
१. श्री समयसार मोक्षअधिकार गाथा २९२ नी श्री जयसेनाचार्य कृत टीका. पा. ३८३३८४. (श्री
राजचंद्र जैन शास्त्रमाळा)
दर्शन अवलोकन, सो जुदा, गहै वस्तु सामान्यहि तदा;
विन आकार विशेषनि हीन, जिनमत भाषै यों परवीन. ४३.
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बृहद्द्रव्यसंग्रह