Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा ४३
गाथार्थःपदार्थोमां विशेषपणुं कर्या विना (भेद पाड्या विना), आकार अर्थात्
विकल्प कर्या विना, पदार्थोनुं जे सामान्यपणे (सत्तावलोकनरूप) ग्रहण तेने परमागममां
दर्शन कहेवामां आवे छे.
व्याख्याः‘‘जं सामण्णं गहणं भावाणं’’ जे सामान्यपणे अर्थात् सत्तावलोकनरूपे
ग्रहण करवुंपरिच्छेदन करवुं; कोनुं ग्रहण करवुं? पदार्थोनुंभावोनुं ग्रहण करवुं; केवी
रीते? ‘‘णेव कट्टुमायारं’’ न करीने; शुं न करीने? आकार अथवा विकल्प; ते पण शुं करीने?
‘‘अविसेसिदूण अट्ठे’’ पदार्थोनो विशेष (भेद) न करीने; क्या रूपे? आ सफेद छे, आ कृष्ण
छे, आ दीर्घ छे, आ ह्नस्व छे, आ घट छे, आ पट छे इत्यादि रूपे; ‘‘दंसणमिदि भण्णए
समए’’ ते परमागममां सत्तावलोकनरूप दर्शन कहेवाय छे. आ दर्शनने ज तत्त्वार्थश्रद्धान
लक्षणवाळुं सम्यग्दर्शन न कहेवुं. शा माटे न कहेवुं? केम के ते श्रद्धान तो विकल्परूप
छे अने आ दर्शन विकल्परहित छे. अहीं तात्पर्य आ छेः ज्यारे कोई पण कंई पण
अवलोके छे
जुए छे, त्यारे ज्यां सुधी ते विकल्प न करे त्यां सुधी सत्तामात्रना ग्रहणरूप
दर्शन कहेवाय छे, पछी शुक्ल वगेरे विकल्प थतां ज्ञान कहेवाय छे. ४३.
यत् सामान्यं ग्रहणं भावानां नैव कृत्वा आकारम्
अविशेषयित्वा अर्थान् दर्शनं इति भण्यते समये ।।४३।।
व्याख्या‘‘जं सामण्णं गहणं भावाणं’’ यत् सामान्येन सत्तावलोकनेन ग्रहणं
परिच्छेदनं, केषां ? भावानां पदार्थानां; किं कृत्वा ? ‘‘णेव कट्टुमायारं’’ नैव कृत्वा, कं ?
आकारं विकल्पं, तदपि किं कृत्वा ? ‘‘अविसेसिदूण अट्ठे’’ अविशेष्याविभेद्यार्थान्; केन
रूपेण ? शुक्लोऽयं, कृष्णोऽयं, दीर्घोऽयं, ह्स्वोऽयं, घटोऽयं, पटोऽयमित्यादि
‘‘दंसणमिदि
भण्णए समए’’ तत्सत्तावलोकं दर्शनमिति भण्यते समये परमागमे नेदमेव
तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणं सम्यग्दर्शनं वक्तव्यम् कस्मादितिचेत् ? तत्र श्रद्धानं विकल्परूपमिदं तु
निर्विकल्पं यतः अयमत्र भावःयदा कोऽपि किमप्यवलोकयति पश्यति, तदा यावत्
विकल्पं न करोति तावत् सत्तामात्रग्रहणं दर्शनं भण्यते, पश्चाच्छुक्लादिविकल्पे जाते
ज्ञानमिति
।।४३।।
१. ते श्रद्धा तो विकल्परूप छे=ते श्रद्धा बधा पदार्थोथी भिन्न निज शुद्ध परमात्मद्रव्यने विषय बनावे छे.
२. अर्थोना आकारोनुं अवभासन ते विकल्प.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २०७