Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Mukta Jeevone Darshan Ane Gyan Ek Sathe Ja Thay Chhe.

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हवे छद्मस्थोने ज्ञान, सत्तावलोकनरूप दर्शनपूर्वक थाय छे अने मुक्त जीवोने दर्शन
अने ज्ञान एक साथे ज थाय छेएम प्रतिपादन करे छेः
गाथा ४४
गाथार्थःछद्मस्थ जीवोने दर्शनपूर्वक ज्ञान होय छे केम के छद्मस्थोने ज्ञान
अने दर्शन ए बन्ने उपयोग एक साथे होता नथी. केवळी भगवानने ज्ञान अने दर्शन
ए बन्नेय उपयोग एक साथे होय छे.
टीकाः‘‘दंसणपुव्वं णाणं छदमत्थाणं’’ छद्मस्थसंसारी जीवोने सत्तावलोकनरूप
दर्शनपूर्वक ज्ञान होय छे. केम? ‘‘ण दोण्णि उवउग्गा जुगवं जह्मा’’ कारण के, छद्मस्थोने
ज्ञानोपयोग अने दर्शनोपयोगए बन्ने एक साथे होता नथी. ‘‘केवलिणाहे जुगवं तु ते
दो वि’’ केवळीभगवानने ज्ञान अने दर्शन उपयोग बन्ने एक साथे ज होय छे.
तेनो विस्तारःचक्षु आदि इन्द्रियोना पोतपोताना क्षयोपशम प्रमाणे पोताने
अथ छद्मस्थानां ज्ञानं सत्तावलोकनदर्शनपूर्वकं भवति, मुक्तात्मनां युगपदिति
प्रतिपादयति :
दंसणपुव्वं णाणं छदमत्थाणं ण दोण्णि उवउग्गा
जुगवं जह्मा केवलिणाहे जुगवं तु ते दो वि ।।४४।।
दर्शनपूर्व्वं ज्ञानं छद्मस्थानां न द्वौ उपयोगौ
युगपत् यस्मात् केवलिनाथे युगपत् तु तौ द्वौ अपि ।।४४।।
व्याख्या‘‘दंसणपुव्वं णाणं छदमत्थाणं’’ सत्तावलोकनदर्शनपूर्वकं ज्ञानं भवति
छद्मस्थानां संसारिणां कस्मात् ? ‘‘ण दोण्णि उवउग्गा जुगवं जह्मा’’ ज्ञानदर्शनोपयोगद्वयं
युगपन्न भवति यस्मात् ‘‘केवलिणाहे जुगवं तु ते दो वि’’ केवलिनाथे तु युगपत्तौ
ज्ञानदर्शनोपयोगौ द्वौ भवति इति
अथ विस्तर :चक्षुरादीन्द्रियाणां स्वकीयस्वकीयक्षयोपशमानुसारेण तद्योग्यदेश-
छदमस्थाकै क्रमतें जान, पहलैं दर्शन पीछैं ज्ञान,
दो उपयोग न एकैं काल, केवलज्ञानी युगपत भाल. ४४
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