Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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वडे विशेषरूप बधा पदार्थोने जाणे छे. वळी आ विशेष छेःज्यारे दर्शन वडे आत्मानुं
ग्रहण थाय छे त्यारे आत्मानी साथे अविनाभूत ज्ञाननुं पण (दर्शन द्वारा) ग्रहण थई
जाय छे, अने ज्ञाननुं ग्रहण थतां ज्ञानना विषयभूत बाह्य वस्तुनुं पण ग्रहण थई
जाय छे.
प्रश्नःजे आत्माने ग्रहण करे छे तेने आप जो दर्शन कहो छो, तो ‘जे पदार्थोनुं
सामान्य ग्रहण ते दर्शन छे,’ ए गाथानो अर्थ आपना कथनथी केवी रीते घटी शके?
उत्तरः‘सामान्यग्रहण’ एटले ‘आत्मानुं ग्रहण’; ते दर्शन छे.
प्रश्नः‘सामान्य’नो अर्थ ‘आत्मा’ केवी रीते छे?
उत्तरःआत्मा वस्तुनुं ज्ञान करतां, ‘हुं आने जाणुं’, ‘आने न जाणुं’ एवो
विशेषपक्षपात करतो नथी, परंतु सामान्यरूपे वस्तुने जाणे छे, ते कारणे ‘सामान्य’ शब्द
वडे ‘आत्मा’ कहेवामां आवे छे. ए प्रमाणे गाथानो अर्थ छे. घणुं कहेवाथी शुं? जो कोई
पण तर्क अने सिद्धांतनो अर्थ जाणीने, एकान्त दुराग्रहनो त्याग करीने, नयविभाग वडे
मध्यस्थ वृत्ति राखीने व्याख्यान करे छे तो बन्नेय अर्थ (तर्कनो अने सिद्धांतनो) सिद्ध
थाय छे. केवी रीते सिद्ध थाय छे? तर्कमां मुख्यताथी अन्यमतनुं व्याख्यान छे; त्यां ज्यारे
कोई अन्यमती पूछे के, जैनसिद्धांतमां जीवनां दर्शन अने ज्ञान ए बे गुण कह्या छे ते
केवी रीते घटी शके छे? त्यारे तेने कहेवामां आवे के ‘जे आत्माने ग्रहण करे छे ते दर्शन
छे’ तो तेओ समजी शकता नथी, एटले आचार्योए तेमने प्रतीति कराववा माटे स्थूळ
गृहीते सति ज्ञानविषयभूतं बहिर्वस्त्वपि गृहीतं भवति इति अथोक्तं भवता यद्यात्मग्राहकं
दर्शनं भण्यते, तर्हि ‘‘जं सामण्णं गहणं भावाणं तद्दर्शनम्’’ इति गाथार्थः कथं घटते ?
तत्रोत्तरं
सामान्यग्रहणमात्मग्रहणं तद्दर्शनम् कस्मादिति चेत् ? आत्मा वस्तुपरिच्छित्तिं
कुर्वन्निदं जानामीदं न जानामीति विशेषपक्षपातं न करोति; किन्तु सामान्येन वस्तु परिच्छिनत्ति
तेन कारणेन सामान्यशब्देनात्मा भण्यत इति गाथार्थः
किं बहुना, यदि कोऽपि तर्कार्थं सिद्धान्तार्थं च ज्ञात्वैकान्तदुराग्रहत्यागेन नयविभागेन
मध्यस्थवृत्त्या व्याख्यानं करोति, तदा द्वयमपि घटत इति कथमिति चेत् ? तर्के मुख्यवृत्त्या
परसमयव्याख्यानं, तत्र यदा कोऽपि परसमयी पृच्छतिजैनागमे दर्शनं ज्ञानं चेति गुणद्वयं
जीवस्य कथ्यते, तत्कथं घटत इति ? तदा तेषामात्मग्राहकं दर्शनमिति कथिते सति ते न
जानन्ति
पश्चादाचार्यैस्तेषां प्रतीत्यर्थं स्थूलव्याख्यानेन बहिर्विषये यत् सामान्यपरिच्छेदनं तस्य
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बृहद्द्रव्यसंग्रह