Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा ४५
गाथार्थःअशुभकार्यनी निवृत्ति अने शुभकार्यमां प्रवृत्तितेने (व्यवहार)
चारित्र जाणो. व्रत - समिति - गुप्तिरूप एवुं ते (चारित्र) व्यवहारनयथी जिनेंद्रदेवे कह्युं छे.
टीकाःआ ज सरागचारित्रना एकदेश अवयवरूप देशचारित्रनुं प्रथम कथन करे
छे. ते आ प्रमाणे छेमिथ्यात्वादि सात प्रकृतिओना उपशम, क्षयोपशम के क्षय थतां
अथवा अध्यात्मभाषाए कहीए तो निजशुद्धात्माभिमुख परिणाम थतां शुद्धात्मभावनाथी
उत्पन्न, निर्विकार, वास्तविक सुखामृतने उपादेय करीने, संसार
शरीर अने भोगोमां जे
हेयबुद्धिवाळो, सम्यग्दर्शनथी शुद्ध छे, ते चतुर्थ गुणस्थानवाळो, व्रतरहित दार्शनिक कहेवाय
छे. जे अप्रत्याख्यानावरण नामना बीजा कषायनो क्षयोपशम थतां पृथ्वी आदि (
पृथ्वी,
जळ, अग्नि, वायु अने वनस्पतिरूप) पांच स्थावरोना वधमां प्रवृत्त होवा छतां पण
यथाशक्ति त्रसना वधथी निवृत्त होय छे, ते पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक कहेवाय छे.
ते श्रावकना अगियार भेद कहेवामां आवे छेःसम्यग्दर्शनपूर्वक, मद्य, मांस,
मध अने पांच उदुम्बर फळोना त्यागरूप आठ मूलगुणोनुं पालन करतो जे जीव, युद्धादिमां
प्रवृत्त थवा छतां पण पापनी वृद्धि करनार शिकार आदि समान प्रयोजन विनाना
जीवघातथी निवृत्त थयेल छे, ते प्रथम दार्शनिक श्रावक कहेवाय छे. ते ज दार्शनिक श्रावक
ज्यारे त्रस जीवोनी हिंसाथी सर्वथा निवृत्त थईने पांच अणुव्रत, त्रण गुणव्रत अने चार
अशुभात् विनिवृत्तिः शुभे प्रवृत्तिः च जानीहि चारित्रम्
व्रतसमितिगुप्तिरूपं व्यवहारनयात् तु जिनभणितम् ।।४५।।
व्याख्याअस्यैव सरागचारित्रस्यैकदेशावयवभूतं देशचारित्रं तावत्कथ्यते तद्यथा
मिथ्यात्वादिसप्तप्रकृत्युपशमक्षयोपशमक्षये सति, अध्यात्मभाषया निजशुद्धात्माभिमुखपरिणामे
वा सति शुद्धात्मभावनोत्पन्ननिर्विकारवास्तवसुखामृतमुपादेयं कृत्वा संसारशरीरभोगेषु योऽसौ
हेयबुद्धिः सम्यग्दर्शनशुद्धः स चतुर्थगुणस्थानवर्ती व्रतरहितो दार्शनिको भण्यते
यश्चाप्रत्याख्यानावरणसंज्ञद्वितीयकषायक्षयोपशमे जाते सति पृथिव्यादिपञ्चस्थावरवधे प्रवृत्तोऽपि
यथाशक्त्या त्रसवधे निवृत्तः स पञ्चमगुणस्थानवर्ती श्रावको भण्यते
तस्यैकादशभेदाः कथ्यन्ते तथाहिसम्यक्त्वपूर्वकत्वेन मद्यमांसमधुत्यागोदुम्बर-
पञ्चकपरिहाररूपाष्टमूलगुणसहितः सन् संग्रामादिप्रवृत्तोऽपि पापद्धर्यादिभिर्निष्प्रयोजन-
जीवघादादो निवृत्तः प्रथमो दार्शनिकश्रावको भण्यते
स एव सर्वथा त्रसवधे निवृत्तः सन्
मोक्षमार्ग अधिकार [ २१५