Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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शिक्षाव्रत सहित थाय छे, त्यारे ‘व्रती’ नामनो बीजो श्रावक थाय छे. ते ज ज्यारे त्रणेकाळे
सामायिक करे छे त्यारे त्रीजी प्रतिमाधारी, प्रौषध
उपवास करे छे त्यारे चोथी प्रतिमाधारी,
सचित्तना त्यागथी पांचमी प्रतिमाधारी, दिवसे ब्रह्मचर्य पालन करवाथी छठ्ठी प्रतिमाधारी,
सर्वथा ब्रह्मचर्य पालन करवाथी सातमी प्रतिमाधारी, आरंभ वगेरे संपूर्ण व्यापारना
त्यागथी आठमी प्रतिमाधारी, पहेरवा
ओढवानां वस्त्रो सिवाय अन्य सर्व परिग्रहोना
त्यागथी नवमी प्रतिमाधारी, घरव्यापार आदि संबंधी समस्त पापमय कार्योमां संमति
(सलाह) आपवानो त्याग करवाथी दशमी प्रतिमाधारी अने उद्दिष्ट आहारना त्यागथी
अगियारमी प्रतिमानो धारक श्रावक थाय छे. आ अगियार प्रकारना श्रावकोमां पहेली छ
प्रतिमावाळा तारतम्यपणे जघन्य श्रावक छे, पछीनी त्रण प्रतिमावाळा मध्यम श्रावक अने
छेल्ली बे प्रतिमावाळा उत्तम श्रावको गणाय छे
ए प्रमाणे संक्षेपमां देशचारित्रना
दार्शनिक श्रावक वगेरे अगियार भेद जाणवां.
हवे, एकदेश चारित्रना व्याख्यान पछी सकळ चारित्रनो उपदेश करे छे
‘‘असुहादो विणिवित्ती सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं’’ हे शिष्य! अशुभ कार्योथी निवृत्ति अने
शुभ कार्योमां प्रवृत्तिने तुं चारित्र जाण. ते केवुं छे? ‘‘वदसमिदिगुत्तिरूवं ववहारणयादु
जिणभणियं’’ व्रत, समिति अने गुप्तिरूप छे अने व्यवहारनयथी श्री जिनेंद्र भगवंतोए
कहेलुं छे. ते आ प्रमाणे छेप्रत्याख्यानावरण नामना त्रीजा कषायनो क्षयोपशम थतां,
पञ्चाणुव्रतत्रयगुणव्रतशिक्षाव्रतचतुष्टयसहितो द्वितीयव्रतिकसंज्ञो भवति स एव त्रिकाल-
सामायिके प्रवृत्तः तृतीयः, प्रोषधोपवासे प्रवृत्तश्चतुर्थः, सचित्तपरिहारेण पञ्चमः, दिवा
ब्रह्मचर्येण षष्ठः, सर्वथा ब्रह्मचर्येण सप्तमः, आरम्भादिसमस्तव्यापारनिवृत्तोऽष्टमः, वस्त्रप्रावरणं
विहायान्यसर्वपरिग्रहनिवृत्तोनवमः, गृहव्यापारादिसर्वसावद्यानुमतनिवृत्तो दशमः, उद्दिष्टाहार-
निवृत्त एकादशम इति
एतेष्वेकादशश्रावकेषु मध्ये प्रथमषट्कं तारतम्येन जघन्यम्, ततश्च
त्रयं मध्यमम्, ततो द्वयमुत्तममिति संक्षेपेण दार्शनिकश्रावकाद्येकादशभेदाः ज्ञातव्याः
अथैकदेशचारित्रव्याख्यानानन्तरं सकलचारित्रमुपदिशति ‘‘असुहादो विणिवित्ती सुहे
पवित्ती य जाण चारित्तं’’ अशुभान्निवृत्तिः शुभे प्रवृत्तिश्चापि जानीहि चारित्रम् तच्च
कथम्भूतं ? ‘‘वदसमिदिगुत्तिरूवं ववहारणयादु जिणभणियं’’ व्रतसमितिगुप्तिरूपं
व्यवहारनयाज्जिनैरुक्तमिति
तथाहि प्रत्याख्यानावरणसंज्ञतृतीयकषायक्षयोपशमे सति
१. देशचारित्र पांचमे गुणस्थाने अंतरंगमां मिथ्यात्वना तथा प्रथमना बे कषायना अभावरूप होय छे.
२. छठ्ठे गुणस्थाने अंतरंगमां मिथ्यात्वनो त्याग तथा प्रथमना त्रण कषायनो अभाव होय छे.
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