Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Vyavaharacharitrathi Sadhya Nishchy Charitranu Nirupan.

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‘‘विषयकषाओगाढो दुस्सुदिदुच्चित्त दुट्ठगोठ्ठिजुदो उग्गो उम्मग्गपरो उवओगो जस्स सो असुहो ।।’’
[अर्थःजेनो उपयोग विषयकषायोमां मग्न छे, दुःश्रुति (विकथा), दुष्ट चित्त अने
दुष्ट गोष्ठी (खराब सोबत) सहित छे, जे उग्र छे अने उन्मार्गमां तत्पर छे, तेने ते
अशुभ उपयोग
छे.]’’आ गाथामां कहेल लक्षणोवाळा अशुभोपयोगथी निवृत्ति अने
तेनाथी विपरीत शुभोपयोगमां प्रवृत्ति, तेने हे शिष्य! तुं चारित्र जाण. आचारआराधना
आदि चरणानुयोगनां शास्त्रोमां कह्या प्रमाणे ते चारित्र पांच महाव्रत, पांच समिति अने
त्रण गुप्तिरूप छे, तोपण अपहृतसंयम नामनुं शुभोपयोगलक्षणवाळुं सरागचारित्र छे. त्यां,
जे बाह्यमां पांच इन्द्रियोना विषय आदिनो त्याग छे, ते उपचरित
असद्भूतव्यवहार-
नयथी चारित्र छे अने अंतरंगमां जे रागादिनो त्याग छे, ते अशुद्ध निश्चयनयथी चारित्र
छे;
ए रीते नयविभाग जाणवो. ए प्रमाणे निश्चयचारित्रना साधक व्यवहारचारित्रनुं
व्याख्यान कर्युं. ४५.
हवे, ते ज व्यवहारचारित्रथी साध्य निश्चयचारित्रनुं निरूपण करे छेः
‘‘विसयकसाओगाढो दुस्सुदिदुच्चित्तदुट्ठगोट्ठिजुदो उग्गो उम्मग्गपरो उवओगो जस्स सो
असुहो ।।।।’’ इति गाथाकथितलक्षणादशुभोपयोगान्निवृत्तिस्तद्विलक्षणे शुभोपयोगे प्रवृत्तिश्च हे
शिष्य ! चारित्रं जानीहि तच्चाचाराराधनादिचरणशास्त्रोक्तप्रकारेण पञ्चमहाव्रतपञ्च-
समितित्रिगुप्तिरूपमप्यपहृतसंयमाख्यं शुभोपयोगलक्षणं सरागचारित्राभिधानं भवति तत्र योऽसौ
बहिर्विषये पञ्चेन्द्रियविषयादिपरित्यागः स उपचरितासद्भूतव्यवहारेण यश्चाभ्यन्तरे
रागादिपरिहारः स पुनरशुद्धनिश्चयेनेति नयविभागो ज्ञातव्यः
एवं निश्चयचारित्रसाधकं
व्यवहारचारित्रं व्याख्यातमिति ।।४५।।
अथ तेनैव व्यवहारचारित्रेण साध्यं निश्चयचारित्रं निरूपयति :
बहिरब्भंतरकिरियारोहो भवकारणप्पणासट्ठं
णाणिस्स जं जिणुत्तं तं परमं सम्मचारित्तं ।।४६।।
१. श्री प्रवचनसार गा. १५८.
२. आनुं स्पष्टीकरण गा. ४५नी फूटनोटमां आवी गयुं छे.
बाह्याभ्यंतर किरिया रोकि, आतम शुद्ध गहै अवलोकि,
आस्रव बंध अभाव निमित्त, ज्ञानी धहैं परम चारित्त. ४६.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २१७