Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Dhyanana Abhyasano Upadesh, Dhyata Purushanu Lakshan.

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हवे, ध्यातापुरुषनुं (ध्यान करनार पुरुषनुं) लक्षण कहे छेः
गाथा ४८
गाथार्थःजो तमे विचित्र (अनेक प्रकारना) अथवा विचित्त (विकल्पजाळ
रहित) ध्याननी सिद्धि माटे चित्तने स्थिर करवा इच्छता हो, तो इष्ट अने अनिष्ट
इन्द्रिय
विषयोमां मोह, राग अने द्वेष न करो.
टीकाः‘‘मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह’’ समस्त मोहरागद्वेषजनित
विकल्पजाळथी रहित निज परमात्मतत्त्वनी भावनाथी उत्पन्न परमानंद जेनुं एक लक्षण
छे, एवा सुखामृतना रसथी उत्पन्न थयेल अने ते ज परमात्मसुखना आस्वादमां लीन
तन्मयरूप जे परमकळा अर्थात् परम संवित्ति, तेमां स्थिर थईने हे भव्य जीवो! मोह,
राग अने द्वेष न करो. क्या विषयोमां?
‘‘इट्ठणिट्ठअट्ठेसु’’ माळा, स्त्री, चन्दन, तांबूल आदि
इष्ट इन्द्रियविषयोमां अने साप, विष, कंटक, शत्रु, रोग वगेरे अनिष्ट इन्द्रियविषयोमां.
शुं इच्छता हो तो राग
द्वेष न करवा? ‘‘थिरमिच्छहि जइ चित्तं’’ जो ते ज परमात्माना
अथ ध्यातृपुरुषलक्षणं कथयति :
मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह इट्ठणिट्ठअट्ठेसु
थिरमिच्छहि जइ चित्तं विचित्तझाणप्पसिद्धीए ।।४८।।
मा मुह्यत मा रज्यत मा द्विष्यत इष्टानिष्टार्थेषु
स्थिरं इच्छत यदि चित्तं विचित्रध्यानप्रसिद्ध्यै ।।४८।।
व्याख्या‘‘मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह’’ समस्तमोहरागद्वेषजनितविकल्पजाल-
रहितनिजपरमात्मतत्त्वभावनासमुत्पन्नपरमानंदैकलक्षणसुखामृतरसात्सकाशादुद्गता संजाता तत्रैव
परमात्मसुखास्वादे लीना तन्मया या तु परमकला परमसंवित्तिस्तत्र स्थित्वा हे भव्या
मोहरागद्वेषान्मा कुरुत
केषु विषयेषु ? ‘‘इट्ठणिट्ठअट्ठेसु’’ स्रग्वनिताचन्दनताम्बूलादय
इष्टेन्द्रियार्थाः, अहिविषकण्टक शत्रुव्याधिप्रभृतयः पुनरनिष्टेन्द्रियार्थास्तेषु यदि किम् ?
‘‘थिरमिच्छहि जइ चित्तं’’ तत्रैव परमात्मानुभवे स्थिरं निश्चलं चित्तं यदीच्छत यूयं
इष्टअनिष्ट वस्तुकूं देखि, रागद्वेष अरु मोह न पेखि;
जो चित्तकूं थिर करना होय, ऐसैं किये ध्यान सिधि होय. ४८.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २२१