Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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ए बे (ए पांच नोकषाय) रागना अंश छे. अरति अने शोकए बे तथा भय अने
जुगुप्साए बे (ए चार नोकषायो) द्वेषना अंश छे, एम जाणवुं.
अहीं, शिष्य पूछे छेःराग, द्वेष आदि कर्मजनित छे के जीवजनित छे? तेनो
उत्तरःस्त्री अने पुरुष ए बन्नेना संयोगथी उत्पन्न थता पुत्रनी जेम, चूनो अने
हळदरना मिश्रणथी उत्पन्न थता वर्णविशेषनी जेम, राग - द्वेष आदि जीव अने कर्म ए
बन्नेना संयोगजनित छे. नयनी विवक्षा प्रमाणे, विवक्षित एकदेश शुद्ध निश्चयनयथी
रागद्वेष कर्मजनित कहेवाय छे अने अशुद्ध निश्चयनयथी जीवजनित कहेवाय छे. आ
अशुद्ध निश्चयनय, शुद्ध निश्चयनयनी अपेक्षाए व्यवहार ज छे. प्रश्नःसाक्षात् शुद्ध
निश्चयनयथी आ राग - द्वेष कोना छे एम अमे पूछीए छीए, उत्तरःसाक्षात् शुद्ध
निश्चयथी, स्त्री अने पुरुषना संयोगरहित पुत्रनी जेम, चूना अने हळदरना संयोग रहित
रंग विशेषनी जेम, तेमनी (राग
- द्वेषादिनी) उत्पत्ति ज नथी; तो कई रीते उत्तर आपीए?
ए रीते ध्याताना व्याख्याननी मुख्यताथी, तेना आश्रये, विचित्र ध्यानना कथन द्वारा
आ गाथा पूरी थई. ४८.
हवे, आगळ ‘मंत्रवाक्यमां स्थित पदस्थ’ ध्यान जे कह्युं हतुं, तेनुं विवरण करे
छेः
च द्वेषाङ्गमिति ज्ञातव्यम् अत्राह शिष्य :रागद्वेषादयः किं कर्मजनिताः किं जीवजनिता
इति ? तत्रोत्तरम्स्त्रीपुरुषसंयोगोत्पन्नपुत्र इव सुधाहरिद्रासंयोगोत्पन्नवर्णविशेष
इवोभयसंयोगजनिता इति पश्चान्नयविवक्षावशेन विवक्षितैकदेशशुद्धनिश्चयेन कर्मजनिता
भण्यन्ते तथैवाशुद्धनिश्चयेन जीवजनिता इति स चाशुद्धनिश्चयः शुद्धनिश्चयापेक्षया व्यवहार
एव अथ मतम्साक्षाच्छुद्धनिश्चयनयेन कस्येति पृच्छामो वयम् तत्रोत्तरम्
साक्षाच्छुद्धनिश्चयेन स्त्रीपुरुषसंयोगरहितपुत्रस्यैव, सुधाहरिद्रासंयोगरहितरङ्गविशेषस्यैव
तेषामुत्पत्तिरेव नास्ति कथमुत्तरं प्रयच्छाम इति
एवं ध्यातृव्याख्यानमुख्यत्वेन तद्व्याजेन
विचित्रध्यानकथनेन च सूत्रं गतम् ।।४८।।
अतः ऊर्ध्वं पदस्थं ध्यानं मन्त्रवाक्यस्थं यदुक्तं तस्य विवरणं कथयति :
१. बे द्रव्यो भेगां मळीने कांई कार्य कदी करी शके नहि,पण जीवना क्षणिक अशुद्ध उपादाने परनिमित्त
एवां कर्मनो आश्रय लीधो छे तेथी ते पराश्रित भाव छे, एम अहीं बताव्युं छे. तेनो आशय
पराश्रितभाव छोडी आत्माश्रितभाव प्रगट कराववानो छे.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २२७