पातनिकाओने मनमां धारण करीने श्रीनेमिचन्द्र आचार्यदेव आ (हवेनी) गाथानुं प्रतिपादन
करे छेः —
गाथा ५०
गाथार्थः — चार घातीकर्मो जेणे नष्ट कर्यां छे, जे (अनंत) दर्शन – सुख – ज्ञान –
वीर्यमय छे, जे उत्तम देहमां बिराजमान छे अने जे शुद्ध (अढार दोष रहित) छे —
एवो आत्मा अर्हंत छे, तेनुं ध्यान करवा योग्य छे.
टीकाः — ‘‘णट्ठचदुघाइकम्मो’’ निश्चयरत्नत्रयात्मक, शुद्धोपयोगी ध्यान वडे पहेलां
घातीकर्मोमां मुख्य एवा मोहनीयनो नाश करीने अने पछी ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा
अंतराय — ए त्रणे घातीकर्मोनो एक साथे नाश करीने जे चार घातीकर्मोना नष्ट करनार
थया छे. ‘‘दंसणसुहणाणवीरियमईओ’’ ते घातीकर्मोना नाशथी अनंत चतुष्टय (अनंत ज्ञान,
दर्शन, सुख अने वीर्य) ने प्राप्त करेल होवाथी सहज शुद्ध, अविनाशी दर्शन – ज्ञान – सुख
अने वीर्यमय छे. ‘‘सुहदेहत्थो’’ निश्चयथी शरीर रहित छे, तोपण व्यवहारनयथी सात
पातनिका पदस्थपिण्डस्थरूपस्थध्यानत्रयस्य ध्येयभूतमर्हत्सर्वज्ञस्वरूपं दर्शयामीति पातनिकात्रयं
मनसि धृत्वा भगवान् सूत्रमिदं प्रतिपादयति : —
णट्ठचदुघाइकम्मो दंसणसुहणाणवीरियमईओ ।
सुहदेहत्थो अप्पा सुद्धो अरिहो विचिंतिज्जो ।।५०।।
नष्टचतुर्घातिकर्म्मा दर्शनसुखज्ञानवीर्यमयः ।
शुभदेहस्थः आत्मा शुद्धः अर्हन् विचिन्तनीयः ।।५०।।
व्याख्या — ‘‘णट्ठचदुघाइकम्मो’’ निश्चयरत्नत्रयात्मकशुद्धोपयोगध्यानेन पूर्वं घातिकर्म-
मुख्यभूतमोहनीयस्य विनाशनात्तदनन्तरं ज्ञानदर्शनावरणान्तरायसंज्ञयुगपद्घातित्रयविनाशकत्वाच्च
प्रणष्टचतुर्घातिकर्मा । ‘‘दंसणसुहणाणवीरियमईओ’’ तेनैव घातिकर्माभावेन लब्धानन्त-
चतुष्टयत्वात् सहजशुद्धाविनश्वरदर्शनज्ञानसुखवीर्यमयः । ‘‘सुहदेहत्थो’’ निश्चयेनाशरीरोऽपि
च्यारि घातिया कर्म नशाय, दर्शन ज्ञान सुख वीरजि पाय;
परम - देहमें तिष्ठै संत, सो आतम चितवो अरहंत. ५०.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २३१