Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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ने सूक्ष्म पदार्थो कोईने प्रत्यक्ष होय छे’ ए निगमनवचन छे. हवे व्यतिरेकनुं द्रष्टांत
कहे छेः ‘जे कोईने पण प्रत्यक्ष होतुं नथी ते अनुमाननो विषय पण होतुं नथी, जेम
के ‘आकाशनां पुष्प आदि’;
ए व्यतिरेकद्रष्टांतनुं वचन छे. ‘अंतरित ने सूक्ष्म पदार्थो
अनुमानना विषय छे’ ए फरीने उपनयनुं वचन छे. तेथी ‘अंतरित ने सूक्ष्म पदार्थो कोईने
प्रत्यक्ष छे,’ ए फरीने निगमन
वचन छे.
‘अंतरित अने सूक्ष्म पदार्थो कोईने प्रत्यक्ष छे, अनुमानना विषय होवाथी’अहीं
‘अनुमानना विषय होवाथी’ ए हेतु छे. सर्वज्ञरूप साध्यमां आ हेतु बधी रीते संभवे
छे; ते कारणे आ हेतु ‘स्वरूपथी असिद्ध’ के ‘भावथी असिद्ध’
एवा विशेषण वडे असिद्ध
नथी. तथा उक्त हेतु, सर्वज्ञरूप पोतानो पक्ष छोडीने सर्वज्ञना अभावरूप विपक्षने सिद्ध
करतो नथी, ते कारणे विरुद्ध पण नथी. वळी ते (हेतु) जेम सर्वज्ञना सद्भावरूप स्वपक्षमां
वर्ते छे तेम सर्वज्ञना अभावरूप विपक्षमां पण वर्ततो नथी, ए कारणे उक्त हेतु
अनैकान्तिक पण नथी. अनैकान्तिकनो शो अर्थ छे? व्यभिचारी, एवो अर्थ छे. वळी उक्त
हेतु प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोथी बाधित पण नथी. वळी ते हेतु (सर्वज्ञने न माननार)
प्रतिवादीओने असिद्ध एवो सर्वज्ञनो सद्भाव सिद्ध करे छे, ते कारणे अकिंचित्कर पण
नथी. आ रीते ‘अनुमाननो विषय होवाथी’
ए हेतु असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक
(बाधित) अने अकिंचित्कररूप जे हेतुना दोषो तेमनाथी रहित छे, तेथी ते सर्वज्ञना
सद्भावने सिद्ध करे ज छे. उपरोक्त प्रकारे सर्वज्ञना सद्भावमां पक्ष, हेतु, द्रष्टांत, उपनय
अने निगमनरूप पांच अंगवाळुं अनुमान जाणवुं.
विशेषजेम नेत्र विनाना पुरुषने दर्पण विद्यमान होय, तोपण प्रतिबिंबोनुं
परिज्ञान थतुं नथी, तेम नेत्रस्थानीय (नेत्र समान) सर्वज्ञतारूप गुणथी रहित पुरुषने
भवति तथैव च यथा सर्वज्ञसद्भावे स्वपक्षे वर्तते तथा सर्वज्ञाभावेऽपि विपक्षेऽपि न वर्तते
तेन कारणेनाऽनैकान्तिको न भवति अनैकान्तिकः कोऽर्थो ? व्यभिचारिति तथैव
प्रत्यक्षादिप्रमाणबाधितो न भवति, तथैव च प्रतिवादिनां प्रत्यसिद्धं सर्वज्ञसद्भावं साधयति,
तेन कारणेनाकिंचित्करोऽपि न भवति
एवमसिद्धविरुद्धानैकान्तिकाकिञ्चित्करहेतु-
दोषरहितत्वात्सर्वज्ञसद्भावं साधयत्येव इत्युक्तप्रकारेण सर्वज्ञसद्भावे पक्षहेतुदृष्टान्तोपनय-
निगमनरूपेण पञ्चाङ्गमनुमानम् ज्ञातव्यमिति
किं च यथा लोचनहीनपुरुषस्यादर्शे विद्यमानेऽपि प्रतिबिम्बानां परिज्ञानं न भवति,
तथा लोचनस्थानीयसर्वज्ञतागुणरहितपुरुषस्यादर्शस्थानीयवेदशास्त्रे कथितानां प्रतिबिम्बस्थानीय-
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बृहद्द्रव्यसंग्रह