गाथा ५१
गाथार्थः — जेणे आठ कर्मनो अने देहनो नाश कर्यो छे, जे लोकालोकने जाणनार
अने देखनार छे अने जे पुरुषाकार छे, — एवो आत्मा सिद्ध छे; लोकना शिखर उपर
बिराजमान छे ते सिद्धपरमेष्ठीनुं तमे ध्यान करो.
टीकाः — ‘णट्ठट्ठकम्मदेहो’ शुभाशुभ मन, वचन अने कायानी क्रियारूप एवो जे
‘द्वैत’ शब्दना अभिधेयरूप कर्मकांड तेनो नाश करवामां समर्थ एवा परम ज्ञानकांड वडे —
के जे ज्ञानकांडमांथी, निज शुद्धात्मतत्त्वनी भावनाथी उत्पन्न, रागादि विकल्पोपाधिरहित
परम आह्लाद जेनुं एकमात्र लक्षण छे एवो सुन्दर, मनोहर आनंद झरे छे, जे निष्क्रिय
छे अने जे अद्वैत शब्दथी वाच्य छे तेना वडे — ज्ञानावरणादि आठ कर्मो अने औदारिक
आदि पांच शरीरोनो नाश कर्यो होवाथी जे ‘नष्ट – अष्ट – कर्म – देह’ छे अर्थात् ‘जेणे आठ
कर्मो अने देह नष्ट कर्यां छे एवो’ छे; ‘लोयालोयस्स जाणओ दट्ठा’ जे पूर्वोक्त ज्ञानकांडनी
भावनाना फळरूप संपूर्ण निर्मळ केवळज्ञान अने केवळदर्शन — ए बन्ने वडे लोकालोकना
त्रण काळना समस्त पदार्थोना विशेष अने सामान्य भावोने एक ज समयमां जाणवा अने
देखवाने लीधे लोकालोकना ज्ञाता अने द्रष्टा छे; ‘‘पुरिसायारो’’ जे निश्चयनयथी अतीन्द्रिय,
अमूर्त, परम चैतन्यथी भरेला शुद्ध स्वभावनी अपेक्षाए निराकार छे, तोपण व्यवहारथी
भूतपूर्वनयनी अपेक्षाए अंतिम शरीरथी कंईक ओछा आकारवाळो होवाने लीधे, मीण
विनाना तेनां बीबां वच्चेना पूतळानी जेम अथवा छायाना प्रतिबिंबनी जेम, पुरुषाकार
नष्टाष्टकर्म्मदेहः लोकालोकस्य ज्ञायकः द्रष्टा ।
पुरुषाकारः आत्मा सिद्धः ध्यायेत लोकशिखरस्थः ।।५१।।
व्याख्या — ‘‘णट्ठट्ठकम्मदेहो’’ शुभाशुभमनोवचनकायक्रियारूपस्य द्वैतशब्दाभिधेयकर्म-
काण्डस्य निर्मूलनसमर्थेन स्वशुद्धात्मतत्त्वभावनोत्पन्नरागादिविकल्पोपाधिरहितपरमाह्लादैकलक्षण-
सुन्दरमनोहरानन्दस्यंदिनिःक्रियाद्वैतशब्दवाच्येन परमज्ञानकाण्डेन विनाशितज्ञानावरणाद्यष्ट-
कर्मौदारिकादिपञ्चदेहत्वात् नष्टाष्टकर्मदेहः । ‘‘लोयालोयस्य जाणओ दट्ठा’’ पूर्वोक्त-
ज्ञानकाण्डभावनाफलभूतेन सकलविमलकेवलज्ञानदर्शनद्वयेन लोकालोकगतत्रिकालवर्त्तिसमस्त-
वस्तुसम्बन्धिविशेषसामान्यस्वभावानामेकसमयज्ञायकदर्शकत्वात् लोकालोकस्य ज्ञाता द्रष्टा
भवति । ‘‘पुरिसायारो’’ निश्चयनयेनातीन्द्रियामूर्त्तपरमचिदुच्छलननिर्भरशुद्धस्वभावेन
निराकारोऽपि व्यवहारेण भूतपूर्वनयेन किञ्चिदूनचरमशरीराकारेण गतसिक्थमूषागर्भाकार-
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