Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Aacharya Parameshthinu Swaroop.

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छे; ‘‘अप्पा’’ एवा लक्षणवाळो आत्मा; ते केवो कहेवाय छे? ‘सिद्धो’ अंजनसिद्ध,
पादुकासिद्ध, गुटिकासिद्ध, खड्गसिद्ध अने मायासिद्ध आदि लौकिकसिद्धोथी विलक्षण,
केवळज्ञानादि अनंतगुणोनी प्रगटता जेनुं लक्षण छे, एवो सिद्ध कहेवाय छे.
‘‘झाएह
लोयसिहरत्थो’’ हे भव्यो! तमे जोयेला, सांभळेला अने अनुभवेला पंचेन्द्रियभोगादिना
समस्त मनोरथरूप अनेक विकल्पसमूहना त्याग वडे, मन - वचन - कायानी गुप्ति जेनुं लक्षण
छे एवा रूपातीत ध्यानमां स्थिर थईने, लोकना शिखर उपर बिराजमान, पूर्वोक्त
लक्षणवाळा सिद्ध परमेष्ठीनुं ध्यान करो.
आ रीते, अशरीरी सिद्धपरमेष्ठीना व्याख्यानरूप आ गाथा पूरी थई. ५१.
हवे, उपाधिरहित शुद्धात्मभावनानी अनुभूतिना अविनाभूत निश्चयपंचाचारलक्षण
निश्चयध्याननुं परंपराए कारणभूत एवुं, निश्चय अने व्यवहार ए बन्ने प्रकारना
पंचाचारोमां परिणत आचार्य परमेष्ठीनी भक्तिरूप अने ‘‘णमो आईरियाणं’’ ए पदना
वच्छायाप्रतिमावद्वा पुरुषाकारः ‘‘अप्पा’’ इत्युक्तलक्षण आत्मा किं भण्यते ? ‘‘सिद्धो’’
अञ्जनसिद्धपादुकासिद्धगुटिकासिद्धखङ्गसिद्धमायासिद्धादिलौकिकसिद्धविलक्षणः केवल-
ज्ञानाद्यनन्तगुणव्यक्तिलक्षणः सिद्धो भण्यते
‘‘झाएह लोयसिहरत्थो’’ तमित्थंभूतं सिद्ध-
परमेष्ठिनं लोकशिखरस्थं दृष्टश्रुतानुभूतपञ्चेन्द्रियभोगप्रभृतिसमस्तमनोरथरूपनानाविकल्प-
जालत्यागेन त्रिगुप्तिलक्षणरूपातीतध्याने स्थित्वा ध्यायत हे भव्या यूयम् इति
एवं
निष्कलसिद्धपरमेष्ठिव्याख्यानेन गाथा गता ।।५१।।
अथ निरुपाधिशुद्धात्मभावनानुभूत्यविनाभूतनिश्चयपञ्चाचारलक्षणस्य निश्चयध्यानस्य
परम्परया कारणभूतं निश्चयव्यवहारपञ्चाचारपरिणताचार्यभक्तिरूपं ‘‘णमो आइरियाणं’’ इति
पदोच्चारणलक्षणं यत्पदस्थध्यानं तस्य ध्येयभूतमाचार्यपरमेष्ठिनं कथयति :
दंसणणाणपहाणे वीरियचारित्तवरतवायारे
अप्पं परं च जुंजइ सो आइरिओ मुणी झेओ ।।५२।।
१. छठ्ठे गुणस्थाने शुद्ध परिणति त्रण कषायना अभावरूप छे ते निश्चय पंचाचार अने तेनी साथे ते ज
काळे व्यवहार पंचाचार होय छे ते (व्यवहार पंचाचार) नो अभाव (व्यय) थतां सातमे गुणस्थाने
निश्चय पंचाचाररूप निश्चयध्यान प्रगटे छे, एम अहीं समजाव्युं छे.
दर्शन ज्ञान समग्र उदार, चारित तप वीरज आचार;
आप आचरै पर अचराय, ऐसैं आचारिज मुनि ध्याय. ५२.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २३९