Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गुणस्थानोमां धर्मध्याननुं निषेधक नथी. १.’’
जे एम कह्युं छे के, ‘दश तथा चौद पूर्वना श्रुतज्ञानथी ध्यान थाय छे’ ते
पण उत्सर्गवचन छे. अपवादव्याख्यानथी तो पांच समिति अने त्रण गुप्तिना
प्रतिपादक सारभूत श्रुतज्ञानथी पण ध्यान थाय छे अने केवळज्ञान पण थाय छे.
जो एवुं अपवादव्याख्यान न होय तो ‘‘तुष
माषनुं उच्चारण करतां श्रीशिवभूति
मुनि केवळज्ञानी थई गया’’ इत्यादि गन्धर्वाराधनादि ग्रन्थोमां कहेलुं कथन केवी रीते
घटे? शंकाः
श्रीशिवभूति मुनि पांच समिति अने त्रण गुप्तिओनुं प्रतिपादन
करनार द्रव्यश्रुत जाणता हता अने भावश्रुत तेमने पूर्णपणे हतुं? उत्तरःएम
न कहेवुं जोईए; केम के जो तेओ पांच समिति अने त्रण गुप्तिना प्रतिपादक
द्रव्यश्रुतने जाणता होत तो ‘न द्वेष कर, न राग कर,’ ए एक पद केम न जाणे?
माटे ज जणाय छे के, पांच समिति अने त्रण गुप्तिरूप आठ प्रवचनमाताप्रमाण
ज भावश्रुत तेमने हतुं अने द्रव्यश्रुत कांई पण नहोतुं. आ व्याख्यान अमे कल्पित
नथी कह्युं; ते चारित्रसार आदि शास्त्रोमां पण कहेवायेलुं छे. ते आ प्रमाणेः
अंतर्मुहूर्तमां जेओ केवळज्ञान प्राप्त करे छे तेओ क्षीणकषाय गुणस्थानमां रहेनार
‘निर्ग्रंथ’ नामना ॠषि कहेवाय छे. तेमने उत्कृष्टपणे चौद पूर्व श्रुतज्ञान होय छे अने
जघन्यपणे पांच समिति अने त्रण गुप्ति जेटलुं ज श्रुतज्ञान होय छे.
यथोक्तं दशचतुर्दशपूर्वगतश्रुतज्ञानेन ध्यानं भवति तदप्युत्सर्गवचनम्
अपवादव्याख्यानेन पुनः पञ्चसमितित्रिगुप्तिप्रतिपादकसारभूतश्रुतेनापि ध्यानं भवति
केवलज्ञानश्च
यद्येवमपवादव्याख्यानं नास्ति तर्हि ‘‘तुसमासं घोसन्तो सिवभूदी केवली जादो’’
इत्यादिगन्धर्वाराधनादिभणितं व्याख्यानम् कथम् घटते ? अथ मतम्पञ्चसमिति-
त्रिगुप्तिप्रतिपादकं द्रव्यश्रुतमिति जानाति इदं भावश्रुतं पुनः सर्वमस्ति नैवं वक्तव्यम् यदि
पञ्चसमितित्रिगुप्तिप्रतिपादकं द्रव्यश्रुतं जानाति तर्हि ‘‘मा रूसह मा तूसह’’ इत्येकं पदं किं
न जानाति
तत एव ज्ञायतेऽष्टप्रवचनमातृप्रमाणमेव भावश्रुतं, द्रव्यश्रुतं पुनः किमपि नास्ति
इदन्तु व्याख्यानमस्माभिर्न कल्पितमेव तच्चारित्रसारादिग्रन्थेष्वपि भणितमास्ते तथाहि
अन्तर्मुहूर्तादूर्ध्वं ये केवलज्ञानमुत्पादयन्ति ते क्षीणकषायगुणस्थानवर्त्तिनो निर्ग्रंथसंज्ञा ऋषयो
भण्यन्ते
तेषां चोत्कर्षेण चतुर्दशपूर्वादिश्रुतं भवति, जघन्येन पुनः पञ्चसमिति-
त्रिगुप्तिमात्रमेवेति
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बृहद्द्रव्यसंग्रह