Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Aa Kale Moksha Nathi Mate Aa Kale Dhyan Nishprayojan Chhe Te Shankanu Nivaran.

< Previous Page   Next Page >


Page 257 of 272
PDF/HTML Page 269 of 284

 

background image
शंकाःमोक्षने माटे ध्यान करवामां आवे छे अने आ काळे मोक्ष तो नथी; तो
ध्यान करवानुं शुं प्रयोजन छे? उत्तरःएम नथी, केम के आ काळे पण परंपराए
मोक्ष छे. प्रश्नःपरंपराए मोक्ष केवी रीते छे? उत्तरःध्यान करनार स्वशुद्धात्मानी
भावनाना बळथी संसारनी स्थिति अल्प करीने स्वर्गमां जाय छे, त्यांथी आवीने
मनुष्यभवमां रत्नत्रयनी भावना प्राप्त करीने शीघ्र मोक्ष जाय छे. जे भरत, सगर,
रामचंद्रजी, पांडवो वगेरे मोक्षे गया छे तेओ पण पूर्वभवमां भेदाभेद
रत्नत्रयनी
भावनाथी संसारनी स्थिति घटाडीने पछी मोक्षे गया छे. ते ज भवे बधाने मोक्ष थाय
छे, एवो नियम नथी.
उपरोक्त कथन प्रमाणे अल्प श्रुतज्ञानथी पण ध्यान थाय छे ए जाणीने शुं करवुं?
[दुर्ध्यान छोडीने ध्यान करवुं, एम समजाववामां आवे छे.] ‘‘द्वेषथी कोईने मारवा,
बांधवा के अंग कापवानुं अने रागथी परस्त्री आदिनुं जे चिंतवन छे तेने निर्मळबुद्धिना
धारक आचार्यो जिनमतमां अपध्यान कहे छे.१. हे जीव, संकल्परूपी कल्पवृक्षनो आश्रय
करवाथी तारुं चित्त आ मनोरथरूपी सागरमां डूबी जाय छे; ते विकल्पोमां वास्तविक रीते
तारुं कांई पण प्रयोजन सिद्ध थतुं नथी, ऊलटुं कलुषतानो आश्रय करनाराओनुं अकल्याण
थाय छे. २. जेवी रीते दुर्भाग्यथी दुःखी मनवाळा तारा अंतरमां भोग भोगववानी
इच्छाथी व्यर्थ तरंगो ऊठ्या करे छे तेवी रीते जो ते मन परमात्मरूप स्थानमां स्फुरायमान
अथ मतंमोक्षार्थं ध्यानं क्रियते न चाद्य काले मोक्षोऽस्ति; ध्यानेन किं
प्रयोजनम् ? नैवं, अद्य कालेऽपि परम्परया मोक्षोऽस्ति कथमिति चेत् ? स्वशुद्धात्म-
भावनाबलेन संसारस्थितिं स्तोकां कृत्वा देवलोकं गच्छति, तस्मादागत्य मनुष्यभवे
रत्नत्रयभावनां लब्ध्वा शीघ्र मोक्षं गच्छतीति
येऽपि भरतसगररामपाण्डवादयो मोक्षं गतास्तेपि
पूर्वभवे भेदाभेदरत्नत्रयभावनया संसारस्थितिं स्तोकां कृत्वा पञ्चान्मोक्षं गताः तद्भवे सर्वेषां
मोक्षो भवतीति नियमो नास्ति एवमुक्तप्रकारेण अल्पश्रुतेनापि ध्यानं भवतीति ज्ञात्वा किं
कर्तव्यम्‘‘वधबन्धच्छेदादेर्द्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादेः आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने
विशदाः संकल्पकल्पतरुसंश्रयणात्त्वदीयं चेतो निमज्जति मनोरथसागरेऽस्मिन् तत्रार्थतः
तव चकास्ति न किंचनापि पक्षेऽपरं भवति कल्मषसंश्रयस्य दौर्विध्यदग्धमन-
सोऽन्तरुपात्तमुक्तेश्चित्तं यथोल्लसति ते स्फु रितोत्तरङ्गम् धाम्नि स्फु रेद्यदि तथा परमात्मसंज्ञे
१. श्री रत्नकरंड श्रावकाचार गा. ७८
२. श्री यशस्तिलक चम्पू अ. २ गा. १३२
३. श्री यशस्तिलक चम्पू अ. २ गा. १३४
मोक्षमार्ग अधिकार [ २५७