Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Mokshana Vishayama Nayavichar.

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थाय तो तारो जन्म केवी रीते निष्फळ थाय? ३. आकांक्षाथी कलुषित थयेलो अने काम
भोगोमां मूर्च्छित एवो आ जीव भोग न भोगववा छतां पण भावथी कर्मो बांधे छे.
४.
इत्यादिरूप (उक्त गाथाओमां कहेला) दुर्ध्यानने छोडीने (आम करवुं)
निर्ममत्वमां स्थिर थईने, अन्य पदार्थोमां ममत्वबुद्धिनो हुं त्याग करुं छुं; मने आत्मानुं
ज अवलंबन छे, अन्य सर्वनो हुं त्याग करुं छुं. १. मारो आत्मा ज दर्शन छे, आत्मा
ज ज्ञान छे, आत्मा ज चारित्र छे, आत्मा ज प्रत्याख्यान छे, आत्मा ज संवर छे अने
आत्मा ज योग छे. २. ज्ञानदर्शनलक्षणवाळो एक मारो आत्मा ज शाश्वत छे अने अन्य
सर्व संयोगलक्षणवाळा भावो माराथी बाह्य छे. ३.इत्यादि सारभूत पदोनुं ग्रहण करीने
ध्यान करवुं.
हवे, मोक्षना विषयमां फरीथी नयविचार कहेवामां आवे छेःप्रथम तो मोक्ष
बंधपूर्वक छे. ते ज कह्युं छे‘‘जो जीव मुक्त छे तो पहेलां ए जीवने बंध अवश्य
होवो जोईए. केम के जो बंध न होय तो मोक्ष केवी रीते होई शके? अबंधनी (बंधायेलो
न होय तेनी) मुक्ति थती नथी तो मुञ्च् धातुनो प्रयोग ज नकामो छे.’ शुद्ध निश्चयनयथी
बंध नथी तथा बंधपूर्वक मोक्ष पण नथी. जो शुद्ध निश्चयनयथी बंध होय तो सदाय बंध
कौतस्कुती तव भवेद्विफला प्रसूतिः कंखिद कलुसिदभूतो कामभोगेहिं मुच्छिदो जीवो
ण य भुंजंतो भोगे बंधदि भावेण कम्माणि ’’ इत्याद्यपध्यानंत्यक्त्वा‘‘ममत्तिं
परिवज्जामि णिम्ममत्तिमुवट्ठिदो आलंवणं च मे आदा अवसेसाइं वोसरे आदा खु मज्झ
णाणे आदा मे दंसणे चरित्ते य आदा पच्चक्खाणे आदा मे संवरे जोगे एगो मे सस्सदो
अप्पा णाणदंसणलक्खणो सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ’’
इत्यादिसारपदानि गृहीत्वा च ध्यानं कर्त्तव्यमिति
अथ मोक्षविषये पुनरपि नयविचारः कथ्यते तथा हिमोक्षस्तावत् बंधपूर्वकः
तथाचोक्तं‘‘मुक्तश्चेत् प्राक्भवेद्बन्धो नो बन्धो मोचनं कथम् अबन्धे मोचनं नैव
मुञ्चेरर्थो निरर्थकः ’’ बंधश्च शुद्धनिश्चयनयेन नास्ति, तथा बंधपूर्वको मोक्षोऽपि यदि
पुनः शुद्धनिश्चयेन बंधो भवति तदा सर्वदैव बंध एव, मोक्षो नास्ति किंचयथा
१. श्री मूळाचार अ. २ गा. ८१. २.श्री नियमसार गाथा ९९.
३. श्री नियमसार गाथा १००. ४.श्री नियमसार गाथा १०२.
५. श्री परमात्म प्रकाश अ. १ गाथा ५९ टीका.
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